For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नख-दंत के संसार में गुम

ढूंढता निज मर्म हूँ  मैं

ये रूचिर

रूपक तुम्‍हारे

गुंबजों की

पीढि़यां

दंगों के

फूलों से चटकी

कुछ आरती,

कुछ सीढि़यां

थुथकार की सीली धरा पर

सूखता गुण-धर्म हूँ मैं

रंगों की

थोड़ी समझ है

कृष्‍ण तक तो

श्‍वेत था

आह्लाद के

परिपाक में भी

एकसर

समवेत था

युगबोध पर कहता मुझे है

कि नहीं यति-धर्म हूँ मैं

तन ऐंठती

धूसर हवाएं

छीजता

विश्‍वास है

प्राचीर में

पैबस्‍त जड़ भी

करती मेरा

उपहास है

किरदार जो आए नए हैं

कहते हैं अपकर्म हूँ मैं

अब कोई

सुनता कहां है

इस पुरा

फ़नकार को

अभ्‍यस्‍त हैं

अब यूथ सारे

सीत्‍कार को

चीत्‍कार को

चीथड़े वल्‍कल मेरे अब

जीर्ण सा इक वर्म हूँ मैं

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

यति  - धर्म : सनातन धर्म के अर्थ में प्रयुक्‍त

वर्म : घर के अर्थ में प्रयुक्‍त

Views: 824

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 3:15pm

//अनुपम सूत्र आपने पकड़ा दिया, अब भूल बिल्‍कुल नहीं होगी वादा है । //

आदरणीय, यह सूत्र कई बार संप्रेषित हुआ है.

//रेगुलर रहने की कोशिश करूं तब भी नहीं रह सकता, परिवार कहीं कार्यक्षेत्र कहीं, दौरा कहीं, बड़ी गड़बड़ है, लगता है हमेशा लैपटाप लेकर ही चलना पड़ेगा//

जो गति तोरी, वही गति मोरी .. या कइयों की..  :-)))

लैपटॉप और मोबाइल, ये तो आधुनिक कर्ण के कवच-कुण्डल सदृश हैं.

Comment by राजेश 'मृदु' on October 3, 2013 at 2:58pm

//आप जो कहें, उसकी पंक्तियाँ किसी मान्य विन्यास को जीयें, भले ही विन्यास के समस्त विन्दुओं को आपने ही नियत किया हो//

जय हो आदरणीय, अनुपम सूत्र आपने पकड़ा दिया, अब भूल बिल्‍कुल नहीं होगी वादा है । रेगुलर रहने की कोशिश करूं तब भी नहीं रह सकता, परिवार कहीं कार्यक्षेत्र कहीं, दौरा कहीं, बड़ी गड़बड़ है, लगता है हमेशा लैपटाप लेकर ही चलना पड़ेगा  ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 2:49pm

आप रेगुलर रहिये..  :-))))

इन पन्नों पर कई बार.. बहुत कुछ साझा होता रहता है..  सतत प्रवहमान प्रक्रिया है यह तो.  हा हा हा....

खैर, बात यह है कि आप जो कहें, आदरणीय, उसकी पंक्तियाँ किसी मान्य विन्यास को जीयें, भले ही विन्यास के समस्त विन्दुओं को आपने ही नियत किया हो.

सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on October 3, 2013 at 2:34pm

एक बार पुन: क्षमा चाहता हूं, मैं आपकी 'लत' के साथ मजाक करने का हक रखता भी नहीं हां एक बात जरूर कहूंगा कि जिस शास्‍त्रीयता के निर्वहन की बात आपने की है शायद उसके अंगों - उपांगों को समझने में (ऐसा मैं मुकम्‍मल तौर पर मानता हूं) जरूर कहीं ना कहीं गलती हो रही है जिसकी वजह से ऐसा कुछ हुआ, इस हेतु खुले मन से गुरूजनों को वो सारी खामियां बतानी होंगी ताकि खामियों की समझ भी विकसित हो एवं उनको सुधारने के उपाय भी किए जा सकें, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 2:20pm

आदरणीय, आपके गीतों की यदि मुझे ’लत’ लग गयी है तो आपको कोई हक़ नहीं बनता कि मेरी तलब के साथ आप मज़ाक़ करें.  .. :-)))

मैं आपके ऐसे बहुमुखी नवगीतों को सुनना-पढ़ना चाहता हूँ, इसी ऊँचाई के साथ, आदरणीय. 

किन्तु, मेरा आशय शास्त्रीयता का निर्वहन करते नवगीतों से है, न कि मात्र तथ्य साझा करते नवगीत या रचनाओं से.
तथ्य और तार्किकता को कारिकाओं में बहुत धुना है मैंने. अब मेरा मन यदि सरस बहना चाह रहा है, तो उसे इस सुख से वंचित न करें..

प्लीऽऽऽऽज


सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on October 3, 2013 at 2:09pm

आदरणीय सौरभ जी, आपने सही कहा कि अन्‍यमनस्‍कता कहीं ना कहीं हावी हो गई । स्‍वीकार करता हूं, आगे से खयाल रखूंगा, इस बार क्षमा, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on October 3, 2013 at 2:08pm

आप सबका हार्दिक आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 1, 2013 at 8:03pm

कथ्य और प्रभाव से अत्यंत समृद्ध इस नवगीत पर मैं यदि निश्शब्द हूँ, तो इसके दो कारण हैं.

एक, बहुत कुछ समेट-बटोर लायी यह रचना क्या-क्या नहीं उपलब्ध कराती है ! साधु-साधु ! प्रत्येक बंद सार्थक और स्पष्ट है ! हृदय से बधाई, आदरणीय.
लेकिन दूसरा कारण है प्रस्तुत रचना में प्रयुक्त शिल्प, जोकि  मुझे एकदम से समझ में ही नहीं आया है. आप कृपया बता दें.
या, शिल्प और प्रस्तुतीकरण के प्रति आप अन्यमन्स्क रहे ?
निश्शब्द हूँ. कि, ऐसी रचना का संप्रेषक अपनी शैली को इतना अनगढ़ क्यों रहने देना चाहता है ? क्या कहूँ ?

आप रह-रह कर स्वर-गेयता को प्रभावी होने देते हैं जो शास्त्रीय न होने के कारण रचनाकर्म के साथ धोखा कर जाती है.
ऐसा कुछ कह जाने के लिए क्षमा.. लेकिन और किससे कहूँगा, रचनाकर्मी आप हैं.
सादर

Comment by MAHIMA SHREE on September 28, 2013 at 11:20pm

आदरणीय क्या कहूँ अभिभूत हूँ ... अब तक की आपकी श्रेष्ठतम प्रस्तुति में से एक ... कई बार पढ़ा .... हार्दिक बधाई

Comment by विजय मिश्र on September 28, 2013 at 12:52pm
"रंगों की

थोड़ी समझ है

कृष्‍ण तक तो

श्‍वेत था

आह्लाद के

परिपाक में भी

एकसर

समवेत था

युगबोध पर कहता मुझे है

कि नहीं यति-धर्म हूँ मैं " --- अद्भुत अभिव्यक्ति .हृदयंगम करने योग्य इस अति अर्थपूर्ण रचना के लिए आत्मीय भाव एवं बधाई .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
15 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service