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गज़ल - गांधियों के रूप में ढलते गए

बह्र -- रमल मुसद्दस महजूफ
२१२२, २१२२, २१२
हम चले थे आस में चलते गए
और वो सब हाथ ही मलते गए

खूबसूरत रुत न थी औ रहगुज़र
तीरगी की बाढ़ को छलते गए

खूब रोका कंटकों नें राह में
राह में हम फूल सा खिलते गए

कह रहीं थीं आँधियाँ रुक जा जरा
आँधियों सा राह में चलते गए

झूठ आया रूप धर के सामने
गांधियों के रूप में ढ़लते गए

देख सुन कह मत गलत बुनते रहे
वानरों के पेट भी पलते गए

या खुदा तूने न देखा कारवाँ
चाँदनी ले हाथ में चलते गए

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Poonam Shukla on September 23, 2013 at 10:21am
मैंने अभी तक जितनी भी ग़ज़लें पढ़ी हैं उनमें से पचास प्रतिशत ग़ज़लों में अ का काफ़िया पढ़ा ।तो क्या वो सब गलत है ?
Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on September 23, 2013 at 10:12am

रचना का भाव सुन्दर है पूनम जी !
गिरिराज जी और वीनस भाई जी की बातों का संज्ञान लेते हुए इसे ग़ज़ल में परिवर्तित कीजियेगा !
शुभकामनाएं !!

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 11:07pm

रचना पर अच्छी चर्चा हुई ... विश्वास है जल्द ही इसका संशोधित रूप पढ़ने को मिलेगा जिसमें हम इसे ग़ज़ल की संज्ञा दे सकेंगे
सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 21, 2013 at 4:40pm

आदरनीया आपके प्रयास पर हार्दिक बधाई ...बैसे आदरणीय गिरिराज जी बिलकुल सही कह रहे हैं ..बिना काफिया के ग़ज़ल नहीं हो सकती ..सादर बधाई के साथ 

Comment by annapurna bajpai on September 20, 2013 at 10:46pm
आ0 पूनम जी सुंदर गजल के लिए आपको बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 20, 2013 at 7:35pm

आदरणीय पूनम जी मेरी एक गज़ल ( जिसमे काफिया नही है ) जो आदरणीय वीनस भाई बिना काफिये की गज़ल नही हो सकती कह के खारिज किये थे और मुझे पोस्ट वापस ले ने को कहेव थे , उसका मतला लिख रहा हूँ  आप खुद समझ जायेंगी  , ( छोटी अ ) को काफिया नही माना जाता , ऐसा वीनस भाई का कहना है !!

सुब्ह से ही भूख उसके घर मे आ के बैठ जाती

मुफलिसी भी साथ आ के साथ उसके लेट जाती ----- इसमे काफिया नही है , मुझे पोस्ट वापिस लेना पडा था ! वैसे आप चाहें तो जानकार से और पूछ लें !

Comment by Poonam Shukla on September 20, 2013 at 7:21pm
अभिनव अरुण जी आपका हार्दिक आभार ।मैं अभी गज़ल सीखने का प्रयास कर रही हूँ ।
Comment by Poonam Shukla on September 20, 2013 at 7:19pm
भंडारी जी मेरे हिसाब से आस ,साथ,राह ,हाथ ये काफिया है ।कुछ कमी हो तो मार्गदर्शन करें ।
Comment by Abhinav Arun on September 20, 2013 at 6:48pm

हम चले थे आस में चलते गए
रोशनी थी साथ में चलते गए

           ...... मतला अच्छा हुआ है बधाई आ. पूनम जी !! ख़याल और अदायगी अच्छी है !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 20, 2013 at 2:05pm

आदरणीया पूनम जी सुन्दर बात , सुन्दर रचना के लिये बधाई !! आदरणीया लेकिन काफिया नही है ऐसा लगता है ? में चलते गए 

रदीफ है , तो काफिया ?क्षमा करें , अगर आपने गज़ल कही है तो , मुझे लगता है ये रचना गज़ल की परिधि मे नही आ रही है !!

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