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लघु कथा : रमजान (गणेश जी बागी)

क किलो मटन आज वास्तव में एक किलो का ही लग रहा था । मैंने तराजू और बाट पर नज़र दौड़ाई । मालूम हुआ दोनों बिल्कुल नये हैं । अभी पिछ्ले महीने ही मटन लेने आया था तो पुराना तराजू और घिसे हुए बाट थे । बाट के नीचे से लगा हुआ तब रांगा भी गायब था । एक किलो मटन मानो आठ सौ ग्राम का ही लगता था | 
दुकान पर मौजूद छोटू से मैने धीरे से पूछ ही लिया, "क्या बात है जी, नया तराजू, नये बाट?.." 
छोटू दुकान मालिक की नज़र बचा कर फुसफुसाया, "सर, रमजान का महीना है ना, मालिक का रोज़ा चल रहा है,  ईद बाद फिर वही ........"
  • समाप्त 
(मौलिक व अप्रकाशित)
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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 12, 2015 at 9:19pm

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय इमरान खान जी ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 30, 2013 at 8:35am

लघुकथा पसंद करने हेतु अतिशय आभार राज भाई जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 20, 2013 at 8:58pm

आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ, लेखन कर्म सार्थक हुआ, बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 20, 2013 at 8:55pm

प्रिय अनुज अरुन, लघुकथा आपको अच्छी लगी. यह जान मुझे भी अच्छा लगा, बहुत बहुत आभार | 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 20, 2013 at 8:29pm

लघुकथा को सराहने और बहुमूल्य प्रतिक्रिया हेतु कॉटिश: आभार आदरणीया मंजरी पाण्डेय जी | 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 20, 2013 at 8:27pm

लघुकथा पर उत्साहवर्धन करती हुई टिप्पणी मुग्धकारी है आदरणीय जितेंद्र जी, बहुत बहुत आभार | 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 20, 2013 at 8:26pm

बहुमुल्य प्रतिक्रिया हेतु हृदय से आभार आदरणीया गितिका वेदिका जी |

Comment by इमरान खान on August 19, 2013 at 11:51am
ऐसा करते हुए लोग भूल जाते हैं कि रमजान हो, शव्वाल या फिर मुहर्रम, पाप हमेशा पाप है और पुण्य हमेशा पुण्य. आपकी पैनी नज़र व क़लम को सलाम.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 18, 2013 at 11:39am

आपके बधाइयों के लिए आभारी हूँ आदरणीय डॉ ललित मोहन पन्त जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 18, 2013 at 11:38am

बहुत बहुत आभार प्रिय शुभ्रांशु भाई, मटन को प्याज की महंगाई मार गई थी :-)

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