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अनंत मनोभाव जब,

शब्द से क्यों मौन हो ?

तुम मेरी कौन हो ?

 

किंचित मुझे भी ज्ञान है,

किंचित जो तुमसे ज्ञात हो,

अनुत्तरित सा प्रश्न ये,

उत्तरित हो जाय, कि

आभास से समीपता,

पर दृष्टि से क्यों गौण हो ?

 

लगता मुझे कि ब्रह्म-सी,

नेत्र-शक्ति से परे,

अनुभवीय मात्र हो !

आत्मदर्शनीय, किन्तु

बाह्य हींन गात्र हो !

 

सत्य क्या ? पता नही,

किन्तु, कुछ अनुमान है –

जीव, जीवन में जो हैं,

तप्त, व्याकुल हो रहे,

उनको प्रदान शांतता

हेतु शीतल पौन हो !

सर्व की सर्वस्व तुम,

कैसे कहूँ कि कौन हो !

 

-पियुष द्विवेदी भारत  

(मौलिक व अप्रकाशित)

  

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Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 5, 2013 at 1:34pm

धन्यवाद, आदरणीय सरिता जी !

Comment by Sarita Bhatia on August 5, 2013 at 9:29am

bahut hi badiya piyush bharat ,bahdai ho 

God bless,keep it up 

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 1, 2013 at 7:33am

बहुत बहुत धन्यवाद, महिमा जी !

Comment by MAHIMA SHREE on July 31, 2013 at 11:04pm

बहुत ही सुंदर ..शब्द और भाव का सुंदर समन्वय बधाई आपको

 

 

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