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सोचता हूँ

क्या होगा

इस नीले आकाश के पार

 

कुछ होगा भी

या होगा शून्य

 

शून्य

मन सा खाली

जीवन सा खोखला

आँखों सा सूना

या

रात सा स्याह

 

कैसा होगा सबकुछ

होगी गौरैया वहां?

देह पर रेंगेंगी

चीटियाँ?

 

या होगा सब

इस पेड़ की तरह

निर्जन और उदास;

सागर की बूँद जितना

अकल्पनीय

 

बिना जाए

जाना कैसे जाए

और जाने को चाहिए

पंख

पर पंख मेरे पास तो नहीं

 

चलो पंछी से पूछ आएं

गरुड़ से।

ढूँढते हैं गरुड़ को।

                 - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by बृजेश नीरज on July 26, 2013 at 5:16pm

आदरणीया कुन्ती जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by वेदिका on July 26, 2013 at 12:27pm

लाजवाब रचना!!

बधाई स्वीकारें आदरणीया बृजेश जी!

Comment by coontee mukerji on July 26, 2013 at 2:16am

बृजेश जी , आप की रचना पढ़ी और बार बार पढ़ी.........एक ही बात मन से निकली...'जहाँ न पहूँचे रवि, वहाँ पहूँचे कवि,

सादर

कुंती

Comment by बृजेश नीरज on July 25, 2013 at 10:37pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 25, 2013 at 10:37pm

आदरणीय श्याम जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by annapurna bajpai on July 25, 2013 at 5:32pm

 hardik badhai is sundar rachna ke liye .

Comment by annapurna bajpai on July 25, 2013 at 5:31pm

adarniy brejesh ji apki rachnayen to nishabd kar deti hai . kya bolun samjh nahi pati .

Comment by Shyam Narain Verma on July 25, 2013 at 2:56pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

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