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प्रकृति और मानव (दोहा)

घर मकान की आड़ में , बचा नहीं कुछ शेष!
मानव मद में डूबकर,बदल दिया परिवेश !!१

जल थल दूषित हो रहे, मानव फिर क्यों मौन ?
नयन खोल जब सो रहा , इसे जगाये कौन!!३

बूँद बूँद संचय करो, पौधे भी दें रोप!
स्नेह करेगी फिर धरा,झेलेगा न प्रकोप!!४

माता जिसको कह रहे , उस पर ही अन्याय !
मानव प्रतिदिन मारता, अनगिन कोड़े हाय !!५

धरती हरी भरी रहे ,रंग बिरंगे फूल!
कुछ तो ऐसा कार्य कर ,धरती के अनुकूल!! ६

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on August 4, 2013 at 2:00pm

१.  (तुम) बूँद-बूँद संचय करो  

२.  (आप) पौधे भी दें रोप

४.  (तू) झेलेगा न प्रकोप !!

अब बताइये किसी छंद में यह किस तरह का व्याकरण है ?

आदरणीय सौरभ जी मै  आपके  कहने का अर्थ समझ गया आगे से ध्यान रखूँगा ,आपका बहुत बहुत आभार  //सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 1, 2013 at 12:24am

मेहनत हुई दीख रही है लेकिन अभी और की बहुत गुंजाइश है.  अच्छे वाले दोहे पर पहले बधाई ले --

माता जिसको कह रहे , उस पर ही अन्याय !
मानव प्रतिदिन मारता, अनगिन कोड़े हाय !!५

वाह वाह

 

बूँद बूँद संचय करो, पौधे भी दें रोप!
स्नेह करेगी फिर धरा,झेलेगा न प्रकोप!!४

यह ऐसा दोहा है जिसमें शुतुर्गुर्बा नहीं,  पाठक को बिलरमुर्गा का दोष दीखे तो अन्योक्ति न समझियेगा. यह तो अच्छा हुआ कि ऐसे दोषादि ग़ज़ल को ही मुबारक हैं, छंदों को नहीं.  :-))))

इस दोहे में  तू, तुम और आप का बेजोड़ सम्मिलन है !  इसका आप भी मजा लीजिये --  

१.  (तुम) बूँद-बूँद संचय करो  

२.  (आप) पौधे भी दें रोप

४.  (तू) झेलेगा न प्रकोप !!

अब बताइये किसी छंद में यह किस तरह का व्याकरण है ?

जय-जय

Comment by ram shiromani pathak on July 26, 2013 at 7:49pm

हार्दिक आभार आदरणीय विजय मिश्र  जी  //सादर 

Comment by ram shiromani pathak on July 26, 2013 at 7:48pm

हार्दिक आभार भाई अरुण शर्मा जी  //सादर 

Comment by ram shiromani pathak on July 26, 2013 at 7:48pm

हार्दिक आभार भाई वीनस जी //सादर 

Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 12:38pm
दोहों के भाव प्रेरणा से संतृप्त हैं और सजगता का आमंत्रण देती है . बधाई लें भाई राम शिरोमणिजी
Comment by अरुन 'अनन्त' on July 26, 2013 at 11:44am

भाई राम शिरोमणि पाठक साहब दोहों पर आपका प्रयास बहुत ही सुन्दर हुआ है. इस हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

बूँद बूँद संचय करो, पौधे भी दें रोप!
स्नेह करेगी फिर धरा,झेलेगा न प्रकोप!!४ इस दोहे में प्रवाह बाधित प्रतीत हो रहा है कृपया पुनः देख लें. 

गुरुजन कृपया मार्गदर्शन करें.

बूँद बूँद ? क्या इसमें जगण दोष नहीं है ?

क्या ष के साथ का प्रयोग किया जा सकता है ?

Comment by वीनस केसरी on July 26, 2013 at 3:10am

बहुत खूब राम शिरोमणि भाई

Comment by ram shiromani pathak on July 24, 2013 at 9:06pm

hardik aabhar adarneeyaa annpurna ji///saadar

Comment by ram shiromani pathak on July 24, 2013 at 9:06pm

hardik aabhar adarneey bhai brijesh ji////saadar

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