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1-
शाश्वत प्रेम सदैव है, सृष्टि आदि अनुमन्य।
यह ईश्वर का अंग है, करके सब हों धन्य॥
करके सब हो धन्य, जगत का सार यही है।
वश में होते ईश, प्रेम का काट नहीं है॥
कबिरा मीरा सूर, शशी आदिक इसमें रत।
नहीं वासना युक्त, प्रेम तो सत्व शाश्वत॥

2-
बहती गंगा प्रेम यह, बांध सका नहिं कोय।
अन्हवाये तन प्रेम में, हर मन निर्मल होय॥
हर मन निर्मल होय, कलुष अंतर का मिटता।
नहीं वासना युक्त, प्रेम वश ईश्वर मिलता॥
निकल अचल हिमवान, सिन्धु चंचल में मिलती।
गंगा प्रेम प्रतीक, निरंतर कलकल बहती॥

मौलिक व अप्रकाशित
(संशोधित)

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Comment by Ketan Parmar on July 24, 2013 at 2:32pm

sadar

Comment by Ketan Parmar on July 24, 2013 at 2:32pm

प्रिय विन्ध्येश्वरी जी

accha or sarthak prayas Dr. Prachi Singh ji se main bhi sehmat hoo


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 24, 2013 at 11:49am

प्रिय विन्ध्येश्वरी जी 

प्रीत के उत्तम भावों को शब्द मिले हैं इस अभिव्यक्ति..जिसके लिए बधाई 

कहीं कहीं प्रवाह कुछ बाधित महसूस हुआ..

शुभकामनाएँ 

Comment by shashi purwar on July 23, 2013 at 10:50pm

acchi kundaliyan saurabh ji se sahamat hoon mai ,parantu kundaliyan bahut acchi lagi ,badhai aapko

Comment by annapurna bajpai on July 23, 2013 at 7:01pm

adarniy vinay bhai ji , bahut sundarta ke sath rachi gai kundaliya ke liye badhai .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 23, 2013 at 2:29pm

कुण्डलिया छंद केलिए हार्दिक धन्यवाद विंध्येश्वरी भाई.

थोड़ा और समय यदि दिया गया होता तो पद और निखरते. जैसे -

शाश्वत प्रेम सदैव था, सदा रहा अनुमन्य.........      शाश्वत के साथ था उचित नहीं, भाई
यह ईश्वर का भाव है, जो डूबे वह धन्य॥
जो डूबे वह धन्य, जगत का सार यही है।.......     ..   सार यही है.. ?
वश में रहते ईश, प्रेम की काट नहीं है॥
कबिरा मीरा सूर, शशी सब इसमें मत।..............    सही शब्द मत्त है न ?
नहीं वासना युक्त, प्रेम का सत्व शाश्वत

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on July 23, 2013 at 1:01pm

पहला कुण्डलिया बढियां है, भाई जी ! दूसरे कुण्डलिया के रोले के द्वितीय चरण पर एक बार पुनः दृष्टिपात करें ! 'परम सत्य को जानना' यहाँ प्रवाह बाधित लग रहा है ! बाकी, बधाई !

Comment by विजय मिश्र on July 23, 2013 at 12:59pm
प्राणी और परमात्मा के मध्य प्रेम , शाश्वत सत्य है ,रचना ,भाव और ध्येय सब अतिसुन्दर और प्रभावोत्पादक भी .आभार ग्रहण करें त्रिपाठीजी .
Comment by Shyam Narain Verma on July 23, 2013 at 11:11am
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by aman kumar on July 23, 2013 at 8:30am

सुंदर !

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