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नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल

मत की कीमत मत लगा, जब विपदा आसन्न ।

आहत राहत चाहते, दे मुट्ठी भर अन्न ॥

आहत राहत-नीति से, रह रह रहा कराह |

अधिकारी सत्ता-तहत, रिश्वत रहे उगाह ॥

घोर-विपत आसन्न है, सकल देश है सन्न ।

सहमत क्यूँ नेता नहीं, सारा क्षेत्र विपन्न ॥

नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल |

ले जहमत मतलब बिना, मत शामत से तोल ॥

मौलिक / अप्रकाशित

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Comment

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Comment by annapurna bajpai on July 1, 2013 at 2:22pm

अदरणीय रविकर जी कितनी सुंदर पंक्तियों मे अपने सारी व्यथा कह डाली काश आपकी ये कविता उन नेताओं तक पहुँच पाती लेकिन फिर भी शायद न उनकी अंखे खुलती और न ही कान पर जून भी रेंगती। न जाने किस मिट्टी के बने है ये नेता ।

Comment by aman kumar on July 1, 2013 at 2:01pm

आहत राहत-नीति से, रह रह रहा कराह |

अधिकारी सत्ता-तहत, रिश्वत रहे उगाह ॥

समस्या को सब्दो की माला मे पहनाकर अच्छी माला बना देते है आप ! 

Comment by DrRaaj on July 1, 2013 at 11:24am

अति सुंदर 

Comment by रविकर on July 1, 2013 at 10:44am

बहुत बहुत आभार आदरणीय / आदरणीया-

Comment by शुभांगना सिद्धि on June 30, 2013 at 8:45pm

बहुत अच्छा कहा आपने 

Comment by विजय मिश्र on June 29, 2013 at 5:31pm
इन व्यथा भरी बातों का भी इन चेतनाशून्य जीवों पर असर होगा क्या ? इन स्पष्ट चेतावनियों से भी ये बिगलित होंगे क्या ? प्रयास प्रसंशनीय है रविकरजी , ईश्वर इनमें भी मानवीयता भरें और ये जाग्रत हों .
Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2013 at 4:21pm

बहुत ही सुंदर व मर्मस्पर्शी रचना.....................

Comment by Dr Babban Jee on June 28, 2013 at 10:10pm

Respected Ravikar Ji

My heartiest congratulations to you for giving the voice to speechless entities. Regards

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