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पहला प्रयास है ,निसंकोच समझा दीजिए 

धरती के चिथड़े हुए ,जल बिन सब बेजान |
खाली बर्तन ले सभी ,भटक रहे इन्सान ||

गर्मी से सूखा बढ़ा , जल की हाहाकार |
अफरा तफरी है मची ,प्यासे है नर नार ||

ताल भये सूखे सभी, पारा बढता जाय |
खाली गागर ले फिरे, पानी नजर न आय ||

मिनरल वाटर कंपनी ,धार रूप विकराल |
पानी सारा ले उडी ,जन जन है बेहाल ||

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 30, 2013 at 9:41pm

आ0  सरिता जी,  सुन्दर दोहों की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2013 at 7:41pm

सुन्दर और शुद्ध दोहावली प्रस्तुत की है आ० सरिता भाटिया जी.

हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 30, 2013 at 7:29pm

सुन्दर सरल और प्रथम प्रयास में शुद्ध दोहे रचने के लिए ढेरों बधाई एवं शुभकामनाए आदरनीया सरिता भाटिया जी 

Comment by Shyam Narain Verma on May 30, 2013 at 5:08pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.............
Comment by aman kumar on May 30, 2013 at 3:12pm

अच्छी रचना के लिए बधाई |

Comment by ram shiromani pathak on May 30, 2013 at 11:40am
Bahut sundar likhaa hai apne........hardik badhai
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 30, 2013 at 8:02am

आदरणीया सरिता जी, सादर अभिवादन !

मुझे तो लाजवाब लगा, बहुत बहुत बधाई!
Comment by कल्पना रामानी on May 29, 2013 at 9:46pm

सरिता जी, सारगर्भित और सुंदर दोहों के लिए हार्दिक बधाई

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