For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ठीक ही तो कहा उसने 
क्या दरिद्रों की तरह 
लम्हों के पीले पत्ते 
बटोरती हो और 
और कबाड़ी वाले की तरह 
टेर लगाए फिरती हो 
एहसासों के मोती चुगो 
और राज हंसिनी कहलाओ 
और मैं सोचती हूँ 
उसकी जेब से 
अपने हिस्से की 
अठननी चवन्नी 
झपट कर भाग खड़ी होऊं 
कंजूस एक एक पाई का 
हिसाब रखता है

Gul Sarika 

Views: 535

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 23, 2013 at 11:51pm

दो भिन्न विचारों के टकराव की सुन्दर प्रस्तुति. सुन्दर प्रवाहमयी रचना के लिए सादर बधाई स्वीकारें आदरणीया.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 22, 2013 at 4:54am

कंजूस एक एक पाई का 
हिसाब रखता है

क्या खूबसूरती से कह डाला आपने!

Comment by बृजेश नीरज on May 21, 2013 at 9:47am

बहुत ही सुन्दर! कविता समाप्त होते होते भाव और कहन के चरम पर पहुंच गयी। मेरी बधाई स्वीकारें!

Comment by किशन कुमार "आजाद" on May 20, 2013 at 7:42pm
bahut sundar he
Comment by Abhinav Arun on May 20, 2013 at 3:41pm

आदरणीया सारिका जी , रचना पाठक के मन को अपने साथ उस यात्रा पर ले जाने में सक्षम है जिसका सफ़र वह स्वयं तय करती है , साधुवाद इस प्रवाह और इस भाव भूमि के लिए !!

Comment by Gul Sarika Thakur on May 20, 2013 at 2:28pm

Bahut hi bhagyashaalee hun main jo aap jaise pathak mile ..wastav me dubki lagakar antarnihit bhawon tk pahuchne wale kushal gotakhor hain aap sab.... meri shikayat rahee the hameshaa se apne pathkaon se ..ki wh uthle bhawarth pr apne mantwya dete hain ...sarthak huee meri lekhi ... sahuwaad aap sabhee ko .. Abhara sweekaarain 

Comment by राजेश 'मृदु' on May 20, 2013 at 1:13pm

ऐसा लगता है जैसे किसी अनुभव का अर्द्धांश भर हो पर इसमें अनकहा इतना कुछ है कि उसे ढूंढते-ढूंढते आंखें परेशान हो जाती है, बहुत अच्‍छी रचना है,सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 20, 2013 at 12:43pm

आदरणीया गुल सारिकाजी, बड़े मनोयोग से कई दफ़े आपकी रचना को पढ़ गया. अंतर्निहित भाव एकदम से चौंकाते हैं और आपकी कविता आखिर आते-आते बहुत ऊँची हो जाती है.

हृदय से बधाई स्वीकारें.. . शुभकामनाएँ.

Comment by विजय मिश्र on May 20, 2013 at 10:10am
पीले पत्ते , कबाड़ी , चवन्नी-अठन्नी और फिर हिसाबी कंजूस - बहुत ही सफल हैं आप सारिकाजी अपने बिम्बों के रेखांकन में . सचमुच वो तो ऐसा ही है ,अधेली का भी उलट-फेर नहीं होने देता .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
7 hours ago
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
12 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service