For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चांद सितारे

चुप से हैं।

रात

घनेरी छाई है।।

 

तेज घनी

दुपहरिया में

अब अंगार बरसते हैं।

तपती

बंजर धरती पर

पांव धरें

तो जलते हैं।

पेड़ की

टूटी शाख पर

इक कोंपल

मुरझाई है।।

 

चिटक गयीं

दीवारे भी

छत से

बूंद टपकती है।

जमीं

सहेजी थी मैंने

मुझसे

दूर खिसकती है।

नयनों की

परतें सूखी

दिल में

सीलन छाई है।।

 

देखो

अब आशाओं के

पंख झड़े

तन सूख गए।

कितने कितने

सपनों के

श्वास से

संग छूट गए।

बस

टूटा बिखरा सा ये

जीवन

इक भरपाई है।।

          - बृजेश नीरज

 

(मौलिक व अप्रकाषित)

Views: 1109

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 15, 2013 at 8:48am

यही सबसे अच्छी परिणति है कि अभ्यास और प्रयास बना रहे.

आपको इस नवगीत विधा पर हुई एक अच्छी प्रस्तुति के लिए बहुत-बहुत बधाई.

अज्ञेय का एक वाक्यांश है - दुःख सबको माँजता है.  मैं समझता हूँ यह माँजना तो बहुत बाद की चीज़ है. पहली चीज़ तो ये है कि दुःख सबको बाँधता है. इसी कारण कवि हृदय कातर हुआ शब्दबद्ध होता है.

भाई बृजेशजी, आपके कवि की जो मनोदशा है वह दशा एक तरह से हर नये लिखने वाले की वह मनोदशा है जिससे उसे एक दफ़े अवश्य गुजरना ही गुजरना होता है. आगे चलकर उसका अनुभव, संप्रेषण में आती जाती सहजता से उपजा आत्मवश्वास उसे इन प्राकृतिक भावनाओं के पार दखने लायक बना देता है.

इसी को इंगित कर आदरणीया कल्पना रमानी जी ने कहा है कि निराशावादी दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए.

इस हिसाब से देखा जाय तो बच्चन की निशानिमंत्रण जिसमे सौ से अधिक भाव प्रस्तुतियाँ हैं दुःख और नैराश्य का पुलिंदा ही मानी जायेगी. जिसके बारे में यह भी प्रचलित है कि इसे शिद्दत से सुनते-पढ़ते और महसूस करते पाठकों में से तब के समय में एक-दो ने आत्म-हत्या भी कर ली थी. उन घटनाओं ने तो कहते हैं कि बच्चन तक को हिला कर रख दिया था.

हमने भी बहुत-बहुत पहले, जब तोतली जुबान में बोलना शुरु किया था और मात्राओं की गूढ़ता के सभी पहलुओं से परिचित नहीं हुआ था, कुछ इसी तरह के नैराश्य को यों शब्द दिये थे -

टीसता हरबार खालीपन मिलेगा

यार छोड़ो क्या सुनोगे दिल जलेगा

तीन मुट्ठी रात गिन कर

ले लिया दिन एक मुट्ठी

कुछ बने के फेर में जलती रही

गीली अँगीठी

है धुँआती आग बोलो क्या बनेगा !

यार छोड़ो क्या सुनोगे दिल जलेगा.. .

बृजेश भाईजी, आपका प्रस्तुत प्रयास सराहनीय और श्लाघनीय है. सुधी पाठकों से मिले सुझावों की छाया में आपकी समझ लगातार परिपक्व होती जायेगी, इसका पूरा भान है.

हाँ, यह अवश्य है कि मैं भी आदरणीया कल्पना रमानी जी की कही बातों को अब अपना स्वर देना चाहूँगा, कि, रचनाएँ दुःख के प्राकट्य की बाड़ को बाँधती और जीती अवश्य हैं लेकिन वे कवि को इसे लांघने का उपाय भी इंगित करती हैं जो कवि के अदम्य विश्वास और जीवन के प्रति लगाव का परिचायक हुआ करती हैं जो उसकी रचनाओं से यह उमगते दिखते हैं.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on May 15, 2013 at 7:33am

आदरणीय वीनस जी आपका हार्दिक आभार! आपको रचना पसन्द आयी मेरा श्रम सार्थक हुआ।
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on May 15, 2013 at 7:31am

आदरणीया कल्पना जी मैं कभी बुरा नहीं मानता। प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। दूसरे के विचारों को सुनने से एक नया नजरिया प्राप्त होता है। आपने जो सुझाव दिया है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। आगे अपनी रचनाओं में इस बिन्दु को समाहित करने का प्रयास करूंगा।
दरअसल इस विधा को सीखने के क्रम में यह मेरा प्रथम प्रयास था। नवगीत के मापदण्डों में अपनी रचना को खरा उतारने की कोशिश में इस बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित करना भूल ही गया।
आपका आभार इतना महत्वपूर्ण सुझाव देने हेतु।
मेरी रचना पर भविष्य में भी बेबाक टिप्पणियां करिएगा। मैं बुरा नहीं मानता। आप लोगों से सदैव सीखने को ही मिलता है।
अपना आशीष और स्नेह यूं ही बनाए रखिएगा।
सादर!

Comment by वीनस केसरी on May 14, 2013 at 11:54pm

बृजेश जी
प्राकृतिक बिम्ब का यह रूप भा गया ...
शानदार नवगीत है
हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by कल्पना रामानी on May 14, 2013 at 11:33pm

बृजेश जी, यही तो मैंने भी कहा, हमें शुरू से ही सकारात्मक लिखने की प्रेरणा मिली, रचना के अंत में कुछ उम्मीद भरी पंक्तियाँ जुड़तीं तो इतना सुंदर नवगीत और सुंदर हो जाता। आपका मन अति संवेदन शील है,  शायद मेरी बात का बुरा नहीं माना होगा आपने...

टूटे बिखरे जीवन ने फिर से उम्मीद जगाई है।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 14, 2013 at 10:02pm

आ0 बृजश नीरज भाई जी,  अतिसुन्दर गीत हेतु तहेदिल से बधाई स्वीकारें,   सादर,

Comment by बृजेश नीरज on May 14, 2013 at 10:02pm

आदरणीया कल्पना जी आपका आभार! निराशा में भी आशा की किरण छिपी होती है। घनी अंधेरी रात में भी सुबह की संभावनायें छिपी होती हैं।
आपका फिर से आभार!
सादर!

Comment by कल्पना रामानी on May 14, 2013 at 9:58pm

बहुत मार्मिक नवगीत है, बृजेश जी, लेकिन निराशावादी दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए...

सादर

Comment by बृजेश नीरज on May 14, 2013 at 8:16pm

आदरणीय निकोर जी आपका बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on May 14, 2013 at 8:16pm

राम भाई आपका बहुत बहुत आभार!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service