For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")


ये साँझ सपाट सही
ज्यादा अपनी है

तुम जैसी नहीं

इसने तो फिर भी छुआ है.. .
भावहीन पड़े जल को तरंगित किया है..  
बार-बार जिन्दा रखा है
सिन्दूरी आभा के गर्वीले मान को

कितने निर्लिप्त कितने विलग कितने न-जाने-से..तुम !

किसने कहा मुट्ठियाँ कुछ जीती नहीं ?
लगातार रीतते जाने के अहसास को
इतनी शिद्दत से भला और कौन जीता है !
तुमने थामा.. ठीक
खोला भी ? .. कभी ?
मैं मुट्ठी होती रही लगातार
गुमती हुई खुद में...  

कठोर !


********************

-सौरभ

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1285

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 23, 2013 at 9:39am

आदरणीय गुरूवर सौरभ सर जी,  सादर प्रणाम!  यह सांझ एकाकीपन में कुछ रंग बिखेरती हुई मन की जल तरंगो को तरंगित करके कुछ एहसास और स्मृतियां रोशन कर जाती हैं।  अच्छी हैं,  बहुत अच्छी हैं लेकिन एक आप हैं  कि मुट्ठी बांध कर अहम् में विमुख हो।  माना कि मुटठी में बहुत कुछ है किन्तु किस काम की?  कभी मुटठी खोलकर देखा, कुछ साझा किया, कुछ दान किया?  नही। निष्ठुर!  कठोर हो तुम!  शायद तुम्हे नहीं मालूम कि दान करने से ज्ञान, मान और सहजता की प्राप्ति होती है।  मुटठी को खोलो  हे! निष्ठुर कठोर...!  हृदयंगम रचना।  सादर बधाई स्वीकार करें।

Comment by satish mapatpuri on April 23, 2013 at 1:51am

किसने कहा मुट्ठियाँ कुछ जीती नहीं ?
 लगातार रीतते जाने के अहसास को
इतनी शिद्दत से भला और कौन जीता है !
ऐसे क्षण कम ही आते हैं , जब मैं  नि:शब्द होता हूँ . क्या कहूँ ? .... क्या बोलूँ ? ... पर , कुछ तो कहना ही है .... लो आज मैं कहता हूँ ...... लाजवाब हो ............................ दिली दाद कुबूल करें आदरणीय सौरभ जी .

Comment by Vindu Babu on April 22, 2013 at 6:21pm
सादर प्रणाम आदरणीय गुरुदेव!
तुम जैसी नहीं

इसने तो फिर भी छुआ
भावहीन पड़े जल को तरंगित किया...
बहुत ही भावभीनी प्रस्तुति है श्रीमान्,सादर बधाई स्वीकारें।
Comment by नादिर ख़ान on April 22, 2013 at 4:20pm

ये साँझ सपाट सही 
ज्यादा अपनी है
तुम जैसी नहीं
इसने तो फिर भी छुआ है.. . 
भावहीन पड़े जल को तरंगित किया है..  


बार-बार जिन्दा रखा है

आदरणीय सौरभ जी भाव पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई ।

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 22, 2013 at 2:35pm

आदरणीय गुरुदेव श्री सादर प्रणाम कविता के भाव ने अंतस मन को छू लिया, इस गहरे सागर में तो डूब कर उभरने को जी नहीं चाह रहा है.

ये साँझ सपाट सही
ज्यादा अपनी है

तुम जैसी नहीं ... इन्ही पंक्तियों से मन ज्यों बिना बरसात ही भीग गया है.

ज्यों ज्यों पंक्ति दर पंक्ति पढ़ता गया त्यों त्यों डूबता गया, मन तो यही कह रहा है कुछ पल के लिए यहीं ठहर जाऊं.

भावों के इस सुन्दर सागर में गोता लगवाने हेतु ह्रदय के अन्तः स्थल से कोटिश: भूरि-भूरि बधाई स्वीकारें.

Comment by Abhinav Arun on April 22, 2013 at 1:57pm

"किसने कहा मुट्ठियाँ कुछ जीती नहीं ?
लगातार रीतते जाने के अहसास को 
इतनी शिद्दत से भला और कौन जीता है !
तुमने थामा.. ठीक
खोला भी ? .. कभी ? 
मैं मुट्ठी होती रही लगातार 
गुमती हुई खुद में...  "


वाह क्या कहने बहुत धीर गंभीर पाठक को अंतर की यात्रा कराती रचना , भाव सागर समान गहरे और गहरे पैठ के पश्चात मोती पाना  सुनिश्चित ... अद्भुत गठन की सशक्त अनुपम कृति !!
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 22, 2013 at 1:30pm

ये साँझ सपाट सही 
ज्यादा अपनी है

आदरणीय गुरुदेव सौरभ जी 

सादर अभिवादन. 

सही ही  तो है 

बधाई. 

Comment by Dr.Ajay Khare on April 22, 2013 at 12:17pm

adarniy sourabh ji gagr mai sagar aap bahut huch kah gaye badhai

Comment by वेदिका on April 22, 2013 at 9:32am

अंतर्मुखी मूक स्वरों को मुखर करती हुयी  रचना
....एकल मन से साथी को पुकारते हुए  भी न पुकारती हुयी स्वाभिमानी रचना प्रतीत होती है
सादर गीतिका 'वेदिका'

Comment by manoj shukla on April 22, 2013 at 6:48am

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आदरणीय सौरभ पांडेय जी बधाई स्वीकार करें.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service