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बेरोजगार !!!

सुबह के सात बजे थे!
एक ही स्थान पर अट्ठारह चूल्हे जले थे!
कुल मिला कर बीस-पच्चीस मजदूरों का
भोजन तैयार हो रहा था!
पास ही एक सूखे पेड़ से टेक लगाये
बैठा इन्सान
घुटनों पर कुहनी
कुहनी पर तने हाथ की मुट्ठी पर
ठुड्ढी रखे
नजरों को अट्ठारहों चूल्हों की ओर घुमाता
आंसू बहाता
खाली पेट को रोटी और
रोटी से भूखी आत्मा को संतुष्ट करने की
सोच रहा था!
सहसा एक अश्रु बिंदु
मुह के कोर तक पहुंची
झट से इन्सान ने ढुलकते बिंदु को
तरसती जुबान से चाटी
तभी मजदूरों के बीच कोलाहल बढ़ा था
सभी खा रहे थे
कौन देखता !
सूखे पेड़ की ओर भूख से भूखे इन्सान को
आज तीसरा दिन था
जब उसने सत्तू की अंतिम मुट्ठी भी
लोटे में घोल कर पाँच बार पिया था
और आज बस !
एक अश्रु बिंदु मात्र से ही संतुष्ट हो
रोज़गार की खोज में चल पड़ा था।
(के पी सत्यम)/मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 19, 2013 at 7:34pm

आदरणीय श्री योगी सारस्वत जी, आपको ‘बेरोजगार‘  कविता अच्छी लगी, धन्यवाद एवं बहुत-बहुत आभार! ‘यही हमारे समाज का कटु सत्य है। हम इसके सिवाय कर भी क्या सकते हैं‘?'

Comment by Yogi Saraswat on March 19, 2013 at 2:52pm

सूखे पेड़ की ओर भूख से भूखे इन्सान को
आज तीसरा दिन था
जब उसने सत्तू की अंतिम मुट्ठी भी
लोटे में घोल कर पाँच बार पिया था
और आज बस !
एक अश्रु बिंदु मात्र से ही संतुष्ट हो
रोज़गार की खोज में चल पड़ा था।

बहुत सुन्दर व्यथा

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 18, 2013 at 6:32pm

आदरणीय श्री विजय मिश्र जी, आपकी उदारता को शत् शत् नमन एवं बहुत-बहुत आभार!

Comment by विजय मिश्र on March 18, 2013 at 12:06pm

मर्मस्पर्शी , सकते में ला देने वाला सच , जमीन से कटकर शहर में भटक रही भारतीय आत्माओं की  कथा है आपकी कविता , केवलजी ! बहुत सजीब और यथार्थ के धरातल पर पूरे वजूद के साथ खड़ी है  . साधू -साधू .

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