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कुम्हार

 

रूप दे दो

इधर उधर बिखरी हुई है

ये मिट्टी

रौंद रहे हैं लोग

रंग काला पड़ने लगा

कुछ कीड़े भी पनपने लगे

 

इसे कोई रूप दे दो

कुम्हार

कि फिर निखर आए

यह एक नए रूप में।

 ----------------------

तारे

 

चाहता हूं मैं भी

तोड़ लाना आसमान के तारे

तुम्हारे लिए

लेकिन क्या करूं

मेरा कद है बौना

हाथ छोटे।

           - बृजेश नीरज

 

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Comment by बृजेश नीरज on March 15, 2013 at 8:12pm

आदरणीय स्वर्ण जी आपका आभार!

Comment by Dr. Swaran J. Omcawr on March 15, 2013 at 7:48pm

आप की नज्में बहुत अर्थ भरपूर हें

Thanks

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 9:37pm

वंदना जी आपका आभार!

Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 9:30pm
महोदय क्षणिकाएं बहुत अच्छी लगीं!
दोनों एक से बढ कर एक हैं.
ईश्वर करे साहित्य हर आयाम आपकी लेखनी मे सिमटता रहे।
शुभकामनाएं
Comment by बृजेश नीरज on March 8, 2013 at 5:07pm

आदरणीय राजेश कुमार जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 8, 2013 at 5:07pm

आदरणीय विजय निकोर जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 8, 2013 at 5:06pm

आदरणीय रकताले जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 8, 2013 at 5:05pm

जवाहर लाल जी आपका आभार!

Comment by राजेश 'मृदु' on March 8, 2013 at 1:12pm

उफ..... इतनी गहराई कि अतल.... क्षणिका नहीं ये एटम बम है, सादर

Comment by vijay nikore on March 8, 2013 at 12:28pm

बहुत सुन्दर, बृजेश जी।

बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

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