For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

देख धनी बलवान के, चिकने चिकने पात।
दुखिया दीन गरीब के, खुरदुर चिटके पात।।

दुखिया सब संसार है, सुख ढूंढन को जाय।
दूजों का जो दुख हरे, सुख खुद चल के आय।।

अपना कष्ट बिसारि के, औरों की सुधि लेय।
नहीं रीति ऐसी रही, अपनी अपनी खेय।।

अपनी अपनी सब कहें, अपनी अपनी सोच।
इक दूजे की नहिं सुनें, लड़ा रहे हैं चोच।।

मन की इच्छा जानकर, चला शहर की ओर।
जाकर देखा जो वहाँ, मचा हुआ है शोर।।


                                      - बृजेश नीरज

Views: 717

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2013 at 9:41pm

भाई संदीप पटेलजी,

आपने सवैया (वर्णिक वृत) पर जो कुछ कहा है उसके आलोक में यह आशा करता हूँ कि आपने ओबीओ के भारतीय छंद विधान समूह में पोस्ट हुए सवैया छंद को और इस कड़ी में विभिन्न सवैयाओं के विधान पर पोस्ट लेखों को अवश्य पढ़ लिया होगा.

शुभेच्छाएँ

Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2013 at 5:40pm

आदरणीय सौरम जी,

आपकी बात दिल तक पैठ कर गयी। आपने जिस तरह प्रकरण को सुलझाया और समझाया है उससे बात जेहन  में पूरी तरह घर कर गयी। इतनी विस्तृत और स्पष्ट व्याख्या आपके अतिरिक्त शायद मुझे कोई और दे भी नहीं सकता था। मैं अवधी क्षेत्र का रहने वाला और बोलने वाला हूं लेकिन इस मर्म को बिसराए बैठा था। आपने जब ‘गै’ लिखा बात मुझे स्पष्ट हो गयी।

यह बात सत्य है और उचित है कि किसी भाषा के शब्द का हम प्रयोग तो करते हैं लेकिन उसके वैशिष्ट्य को आत्मसात नहीं करते।

आपका और प्राची जी का बहुत बहुत आभार मुझे मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 4, 2013 at 1:08pm

जै हो गुरुदेव की आपने पहले ही दवा दे दी है
आपका बहुत बहुत आभार गुरुदेव सौरभ सर जी सादर प्रणाम

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 4, 2013 at 1:06pm

आदरणीय
"जलधि लांघि गये अचरज नाहिं" पढ़ें तो शायद ठीक रहेगा
मात्रिक छंदों में मात्राएँ गिराने का कोई नियम हिन्दी छन्द में तो नहीं है
यद्यपि कहीं कहीं वार्णिक छंदों जैसे सवैया मे ऐसा देखने मिल जाता है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 4, 2013 at 9:18am

आदरणीय सौरभ जी,

आपने एक बहुत ही आधारभूत भ्रम का निवारण किया है..

आंचलिक भाषाओं के उच्चारण और खड़ी बोली हिंदी के उच्चारण में अक्सर हम सब संशय करते है...आंचलिक भाषाओं के स्वराघात वैशिष्ट्य को हमें स्वीकार करना होगा और उसमें और खड़ी हिंदी में भेद को जान समझ कर ही ऐसे संशयों का निवारण हो सकता है.

सादर आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2013 at 1:17am

डॉ.प्राची और भाई बृजेशजी के मध्य हुआ संवाद रोचक है और इस मंच की परिपाटी ’सीखने-सिखाने’ का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है.

एक बात जो आप दोनों के लिए भ्रम का कारण हो रहा है वह स्वर ए को गुरु या लघु मानना. 

मेरा निवेदन है कि आंचलिक भाषाओं यथा, ब्रज, अवधी, भोजपुरी आदि और खड़ी बोली हिन्दी के शब्दों के उच्चारण होने वाले अंतर को मत बिसराइये. 

आंचलिक भाषाओं में शब्दों का उच्चारण स्वराघात पर अधिक निर्भर करता है बनिस्पत खड़ी बोली हिन्दी के.

उदाहरण सदृश भोजपुरी का एक वाक्य देखें - तूँ चल आव.  इस वाक्य हिन्दी व्याकरण के स्वर व्यंजन के नियमों के अनुसार कुल मात्रा होगी ७.

लेकिन इस वाक्य का भोजपुरी उच्चारण ऐसा नहीं है जैसा यहाँ प्रतीत हो रहा है. वह कुछ यों होता है - तूँ चल आवऽ.

यानि स्वराघात के कारण आव का दीर्घ है, न कि प्रतीत होते लघु की तरह.

एक बात और जो थोड़ा और आगे की समझ के लिए आवश्यक होगा. वह ये कि चल का पूरा लघु भी नहीं है बल्कि उस पर स्वराघात के लघु से भी आधा है. यह आंचलिक भाषाओं की विशिष्ट स्वर प्रक्रिया है और इसी कारण उनकी सुन्दरता भी है. लेकिन हिन्दी व्याकरण के अनुसार आधा लघु की कोई अवधारणा ही नहीं है.

गोस्वामी जी के ग्रंथ मानस या हनुमानचलीसा आदि हिन्दी भाषा में न हो कर आंचलिक भाषा अवधी में हैं.

अतः, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं  को वस्तुतः जलधि लांघि गै अचरज नाहीं  की तरह पढें. देखिये समस्या का निवारण हो गया. इस पंक्ति की कुल मात्रा १६  बन रही है.

अर्थात्, आंचलिक भाषा के शब्दों की मात्राओं की गणना या देसज शब्दों की मात्राओं की गणना उच्चारण के अनुसार होती है. होनी चाहिए भी. वहीं खड़ी बोली हिन्दी में मात्र उच्चारण ही मात्रा गणना का आधार न हो कर स्वर-व्यंजन के अनुरूप उनका होना उचित होता है क्यों कि उन शब्दों का लिहाज देसज कत्तई नहीं होता.

हिन्दी भाषा कितने विद्वान आंचलिक भाषाओं के स्वराघात वैशिष्ट्य को न समझ कर इसे छंद में मात्रा गिराना का भ्रम पाल लेते हैं. वस्तुतः हमें आंचलिक भाषाओं की इकाई को उनके वैशिष्ट्य के साथ स्वीकार करना ही होगा, वर्ना हिन्दी भाषा के व्याकरण के चश्में से देख कर बार-बार हम उलझेंगे और बवाल पैदा करते रहेंगे.

तथ्यपरक बात यह हुई  कि रचनाकर्म के क्रम में हम सदा से स्पष्ट रहें कि हमारी रचना की भाषा क्या है. तदनुरूप हम मात्राओं की गणना करेंगे. हिन्दी में देसज शब्दों का सुन्दर प्रयोग होता है, अतः रचनाकार न केवल संवेदनशील हो बल्कि जागरुक भी हो.

विश्वास है, तथ्य स्पष्ट हो पाया.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 4:53pm

आदरणीया प्राची जी आपकी बात स्वीकार्य है। यही उपयुक्त भी होगा। आपके मार्गदर्शन के लिए सादर आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 3, 2013 at 4:50pm

आदरणीय बृजेश जी, 

यहाँ हम सभी समवेत सीखते हैं, आपने मेरे कहे को मान दिया इस हेतु आपका धन्यवाद.

आदरणीय , जहाँ तक मैं जानती हूँ, 'ए' की मात्रा को दीर्घ ही गिना जाता है..

हिंदी छंद विधान में भी और ग़ज़ल लेखन के समय भी.

आप द्वारा दिए गए तुलसीकृत हनुमान-चालीसा के उदाहरण में स्पष्टतः ए की मात्रा को १ ही लिया गया है... किन्तु हमें विधान को साधते समय अपवादों को अपवाद ही मानना है उदाहरण नहीं ! यदि हम उन्हें उदाहरण मान कर चले तो छंद के नियम तो सब व्यर्थ हो जायेंगे.

इसलिए ये ज़रूरी हैं कि हम आधारभूत नियमों पर अपनी समझ को पहले सुदृढ़ करें, फिर उस समझ की नींव पर साहित्यकारों की रचनाओं को समझें बूझें.

यह मेरी समझ भर है, हो सकता है कि कुछ लोगों का अलग मत हो.

शायद अपने उत्तर से आपको संतुष्ट कर पायी.

हार्दिक शुभेच्छाएँ.

Comment by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 1:38pm

पवन जी सादर आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 1:37pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आपका आभार!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
10 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
10 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
12 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
22 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
22 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
yesterday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Feb 8

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service