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भोली जनता को नेता जी मूर्ख बनाना बंद करो।
जनता जाग गई अब दिल्ली धौंस दिखाना बंद करो॥


जन्तर मन्तर से जनता का आजादी अभियान शुरू।
झूठे वादे तानाशाही गया जमाना बंद करो॥


हम सब के मत से ही नेता तुम इतने मतवाले हो।
है तेरी कुछ औकात नहीं रौब दिखाना बंद करो॥


चूस रहे हो खून हमारा अब हमको अहसास हुआ।
शहद लगे विषधर डंकों को पीठ चुभाना बंद करो॥


हम सबके श्रम के पैसों से पाल रहे हो तुम गुण्डे।
परदे के पीछे से छुपकर तीर चलाना बंद करो॥


हुंकार उठे हैं अब प्यादें खैर मनाओ राजा जी।
शतरंजी भाड़े के घोड़ों कूद लगाना बंद करो॥


जब जब धरती के धूल उड़े तब-तब आंधी आयी है।
इसके आगे महल उड़े हैं सामियाना बंद करो॥

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 9:56pm
जी गुरुदेव समझ नहीं सका था।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 16, 2013 at 9:18pm

//गुरदेव क्या यह किसी बह्र के आसपास है?//

हमने अपनी टिप्पणी में कहा है भाई.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 9:10pm
आदरणीय लक्ष्मण सर जी!रचना की सराहना और सुर में सुर मिलान के लिये आभार।
हम जग जाये तो उल्लू खुद ही उड़ जायेगें।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 9:07pm
जी बागी सर जी!
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 9:06pm
पूज्य गुरुदेव सादर नमन!रचना की सराहना के लिये हार्दिक आभार।गुरदेव क्या यह किसी बह्र के आसपास है?
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 16, 2013 at 8:48pm
मुझे भी रचना पढ़कर जोश आ ही गया भाई श्री विन्ध्येश्वरी जी -

सिरफिर है यहाँ बहुत अब मुर्ख बनाना बंद करो 

चुनाव आरहे सिरपर, मुर्ख बनाना झट बंद करो 
ललकार रहे विन्ध्येश्वरी,अब मुर्ख बनाना बंद करो 
पद न जाए पछताना चेतो और मुर्ख बनाना बंद करो 
हार्दिक बधाई   

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 16, 2013 at 8:44pm

विन्ध्येश्वरी भाई, आपकी प्रस्तुति को प्राथमिक तौर पर ग़ज़ल कही जायेगी, काफिया, रदीफ़ का बढ़िया निर्वहन हुआ है, ग़ज़ल हेतु वजन और बहर, तकती आदि की जानकारी आप ग़ज़ल की बातें समूह से देख सकते है ।

अंत में => सवाल बचकाना नहीं है :-)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 16, 2013 at 8:41pm

पन्द्रह गाफ़ के मिसरे पर हुए इस तेवरदार ग़ज़ल के लिए बधाई, विंध्येश्वरी प्रसाद जी.. ..

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 8:31pm
आदरणीय बागी सर जी!रचना की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
एक बचकाना सा प्रश्न-
कुछेक स्थानों को छोड़कर रचना में 2-2मात्राओं के हिसाब से कुल 30मात्रायें हैं।क्या यह रचना गजल हो सकती है?
अनुज की जिज्ञासा है सर!
सादर।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 16, 2013 at 8:27pm
डॉ.साहब रचना की सराहना के लिये भूरिश: आभार।

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