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फहराऊं बुलंदी पे ये ख्वाहिश नहीं रही .

फ़िरदौस इस वतन में फ़रहत नहीं रही ,
पुरवाई मुहब्बत की यहाँ अब नहीं रही .

नारी का जिस्म रौंद रहे जानवर बनकर ,
हैवानियत में कोई कमी अब नहीं रही .

फरियाद करे औरत जीने दो मुझे भी ,
इलहाम रुनुमाई को हासिल नहीं रही .

अंग्रेज गए बाँट इन्हें जात-धरम में ,
इनमे भी अब मज़हबी मिल्लत नहीं रही .

फरेब ओढ़ बैठा नाजिम ही इस ज़मीं पर ,
फुलवारी भी इतबार के काबिल नहीं रही .

लाये थे इन्कलाब कर गणतंत्र यहाँ पर ,
हाथों में जनता के कभी सत्ता नहीं रही .

वोटों में बैठे आंक रहे आदमी को वे ,
खुदगर्जी में कुछ करने की हिम्मत नहीं रही .

इल्ज़ाम लगाते रहे ये हुक्मरान पर ,
अवाम अपने फ़र्ज़ की खाहाँ नहीं रही .

फसाद को उकसा रहे हैं रहनुमा यहाँ ,
ये थामे मेरी डोर अब हसरत नहीं रही .

खुशहाली ,प्यार,अमन बांटा फहर-फहर कर ,
भारत की नस्लों को ये ज़रुरत नहीं रही .

गणतंत्र फ़साना बना हे ! हिन्दवासियों ,
जलसे से जुदा हाकिमी कीमत नहीं रही .

तिरंगा कहे ''शालिनी'' से फफक-फफक कर ,
फहराऊं बुलंदी पे ये ख्वाहिश नहीं रही .

शब्द अर्थ -फ़िरदौस-स्वर्ग ,पुरवाई-पूरब की ओर से आने वाली हवा ,इलहाम -देववाणी ,ईश्वरीय प्रेरणा ,रुनुमाई-मुहं दिखाई ,इन्कलाब -क्रांति ,खाहाँ -चाहने वाला ,मिल्लत-मेलजोल ,हाकिमी -शासन सम्बन्धी ,फ़साना -कल्पित साहित्यिक रचना ,इतबार-विश्वास ,नाजिम-प्रबंधकर्ता ,मंत्री ,फुलवारी-बाल बच्चे ,
 

शालिनी कौशिक[कौशल]

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Comment by seema agrawal on January 27, 2013 at 3:50pm

बहुत खूब रचना शालिनी जी ...गणेश जी की बातों पर थोड़ा गंभीरता से गौर करिये    ..

Comment by shalini kaushik on January 26, 2013 at 9:25pm
aabhar ganesh ji ,aapki salah avshay manoongi.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 26, 2013 at 3:00pm

भावों को बढ़िया उकेरा है , ग़ज़ल की बातें और ग़ज़ल की कक्षा समूह को यदि अध्ययन करें तो सच मानिये , आपको बहुत फायदा होगा । बधाई इस अभिव्यक्ति पर ।

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