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गीत ग़ज़ल की देह तौलते ,,,,,,,,,,,,,,,,,

बदल गयी नीयति दर्पण की चेहेरो को अपमान मिले हैं !
निष्ठायों को वर्तमान में नित ऐसे अवसान मिले हैं !!

शहरों को रोशन कर डाला गावों में भर कर अंधियारे !
परिवर्तन की मनमानी में पनघट लहूलूहान मिले हैं !!

चाह कैक्टसी नागफनी के शौक़ जहाँ पलते हों केवल
ऐसे आँगन में तुलसी को जीवन के वरदान मिले हैं !!

भाग दौड़ के इस जीवन में , मतले बदल गए गज़लों के
केवल शो केसों में सजते ग़ालिब के दीवान मिले हैं !!

गीत ग़ज़ल की देह तौलते अक्सर सुनने वाले देखा !
मन का बोझ बाँट ले ऐसे केवल कुछ इंसान मिले हैं !!

कोई मील का पत्थर बनना क्यों बोलो स्वीकार करे !
हर युग में जब संगमरमर को महलों के सम्मान मिले हैं !!

प्रगति हुयी कुछ ऎसी गति से , उलटे सभी विधान हुए !
कमरों में हरियाली देखी , उपवन सब वीरान मिले हैं !!

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Comment by अमि तेष on December 26, 2012 at 11:34pm

भाग दौड़ के इस जीवन में , मतले बदल गए गज़लों के 
केवल शो केसों में सजते ग़ालिब के दीवान मिले हैं !!
वाह 

Comment by MAHIMA SHREE on December 26, 2012 at 5:34pm

कोई मील का पत्थर बनना क्यों बोलो स्वीकार करे !
हर युग में जब संगमरमर को महलों के सम्मान मिले हैं !!

प्रगति हुयी कुछ ऎसी गति से , उलटे सभी विधान हुए !
कमरों में हरियाली देखी , उपवन सब वीरान मिले हैं
वाह बहुत ही बढ़िया ... बधाई आपको

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 26, 2012 at 4:34pm

शहरों को रोशन कर डाला गावों में भर कर अंधियारे !
परिवर्तन की मनमानी में पनघट लहूलूहान मिले हैं !!

आदरणीय अजय जी सादर 

बहुत खूब 

बधाई. 

Comment by Shyam Narain Verma on December 25, 2012 at 1:07pm

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