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ग़ज़ल - शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है !

यहाँ की भागा दौड़ी में वो बेफ़िक्री ही  भाती  है ,
शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है ।

बनावट वाली राधाओं को उनके कृष्ण कब मिलते ,
वो तो मीरा के होते हैं जो उनको मन में गाती है ।

सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।

पिता की डांट से गुमसुम जो बैठी थी उदासी में ,
लिपटकर माँ के आँचल से वो बच्ची खिलखिलाती है ।

अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,
सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको  सिर नवाती है ।

हटाकर राह से पत्थर मुसाफिर बढ़ते जाना तुम ,
सफलता हौसले वालों को सीने से लगाती है ।

बुराई से बचो बापू के बन्दर सीख देते हैं ,
बुराई आदमी की खूबियों को घुन सी खाती है ।

बदन की ही तरह मन में भी कोई खोट मत रखना ,
मुलम्मों में सड़ी हो चीज़ तो भी गंध आती है ।
                            -   अभिनव अरुण 
                                  [19122012]

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Comment by Abhinav Arun on January 2, 2013 at 3:04pm
आभार सत्यनारायण जी
Comment by Satyanarayan Singh on December 31, 2012 at 12:23pm

अरुण जी

बेहतरीन ग़ज़ल हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by Abhinav Arun on December 29, 2012 at 8:16pm
हार्दिक रूप से शुक्रिया महिमा श्री जी
Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2012 at 3:18pm

सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी याद आती है ।..बहुत खूब

अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,
सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको सिर नवाती है ।सही फरमाया आपने
आदरणीय अभिनव जी .. बहुत -2 बधाइयाँ आपको

Comment by Abhinav Arun on December 22, 2012 at 7:26pm
आदरणीय प्रदीप जी,सीमा जी,राज लाली जी,संदीप जी एवं वीनस जी आप सबके प्रति हार्दिक आभार ,आप सभी के सानिध्य में कुछ लिख-सीख पा रहा हूँ ,सादर वँदन आप सबका!
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on December 22, 2012 at 6:44pm

बेहतरीन ग़ज़ल.. मतले ने ही मन मोह लिया.. सरतापा आनंद आ गया!

मेरे फ़ेवरेट ये दो शे'र

सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,

ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है! और..

बदन की ही तरह मन में भी कोई खोट मत रखना ,

मुलम्मों में सड़ी हो चीज़ तो भी गंध आती है ।

बधाईयां भईया.. :-)

Comment by वीनस केसरी on December 22, 2012 at 12:14am

अरुण जी
खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें

पूरी ग़ज़ल पसंद आई
यह दो अशआर विशेष पसंद आए

ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।
अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,

सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको  सिर नवाती है ।

Comment by राज लाली बटाला on December 22, 2012 at 12:12am

अरुण जी बेहतरीन ग़ज़ल कही है ढेरों दाद कुबूल करें !!!अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,

सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको  सिर नवाती है ।
Comment by seema agrawal on December 21, 2012 at 8:05pm

अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,

सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको  सिर नवाती है........बहुत बढ़िया शेर कहा अरुण जी 
बुराई आदमी की खूबियों को घुन सी खाती है.....सच कहा 
बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है हार्दिक बधाई अरुण जी 
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 21, 2012 at 3:22pm

सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,

ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।.... याद दिला दी ..आभार 
बदन की ही तरह मन में भी कोई खोट मत रखना ,
मुलम्मों में सड़ी हो चीज़ तो भी गंध आती है ।........अनुकरणीय ...बधाई 
आदरणीय अभिनव जी, सादर 

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