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पापा मम्मी आप भी आओ

पापा मम्मी आप भी आओ


उन पुरानी गलिओं से फिर
ख्याल अपने दिल तक आये
आँगन में थे खिलते उन कलियों से
सवाल अपने दिल तक आये
दौरते आते सारे किस्से
कोई बैठकर मुझे सुनाओ
आँखे तरस रही दर्शन को
पापा मम्मी आप भी आओ


गहरी जाती उन घाटीयों से
संकराति गूंजे घूम रही हैं
चट्टानों पे रेत की बूंदे
अब भी मानो झूम रही हैं
भूलते जाते उन पन्नो से
पुरानी कुछ गजलें सुनाओ
सांसें बोल रही धरकन को
पापा मम्मी आप भी आओ


बीते उन त्योहारों में
मेरे चीजें हज़ार सजाओ
बीतते जाते मीलों लम्हों की
नन्ही सी कतार सजाओ
अगले दिन डाकिया संग
अपनी यादें खूब भिजवाओ
सारे पकवान पक गए अब
पापा मम्मी आप भी आओ

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Comment by seema agrawal on November 4, 2012 at 10:50am

बीते उन त्योहारों में 
मेरे चीजें हज़ार सजाओ 
बीतते जाते मीलों लम्हों की 
नन्ही सी कतार सजाओ

भावपूर्ण प्रस्तुति 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 3, 2012 at 10:37am

बहुत कोमल भावनाओं से परिपूर्ण रचना के लिए ह्रदय से बधाई 

Comment by shalini kaushik on November 3, 2012 at 12:53am

आपकी प्रस्तुति सराहनीय हैं आभार 

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