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साथी चल उस देश से
जहाँ प्रेम व्यापार
बेच रहे ईमान को
लोग लगा बाज़ार

लोग लगा बाज़ार
मनुजता बेंचे ऐसे
सोने का सामान
बिके दो कौड़ी जैसे

कह 'प्रवीण' कविराय
जहाँ दीया ना बाती
कहाँ उजाला होत
मोह तज चल तू साथी

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Comment

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Comment by प्रवीण कुमार श्रीवास्तव on July 8, 2012 at 9:48pm

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' जी,हरीश भट्ट जी हार्दिक धन्यवाद

Comment by Harish Bhatt on July 7, 2012 at 11:13am

प्रवीण जी नमस्‍ते, शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 6, 2012 at 11:09pm

लोग लगा बाज़ार
मनुजता बेंचे ऐसे
सोने का सामान
बिके दो कौड़ी जैसे

प्रिय प्रवीण जी खूबसूरत भाव ..मन तो ऐसे ही कहता है ...लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ ? ..आइये यहीं उजाला करें सूरज उगायें ..भ्रमर ५ 

Comment by प्रवीण कुमार श्रीवास्तव on July 6, 2012 at 10:03pm
डॉ. प्राची सिंह जी, रेखा जोशी जी, संगीता स्वरुप जी आप सभी को हार्दिक धन्यवाद.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 6, 2012 at 6:08pm
बहुत सुन्दर, भावप्रधान कुण्डली... साथी चल उस देश से...
बधाई प्रवीण कुमार जी.
Comment by Rekha Joshi on July 6, 2012 at 5:27pm

प्रवीन जी .

साथी चल उस देश से
जहाँ प्रेम व्यापार
बेच रहे ईमान को
लोग लगा बाज़ार,जरा बचके जाना ऐसे देश में ,सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई 
Comment by sangeeta swarup on July 6, 2012 at 11:01am

मोह ही तो नहीं छूटता .... सुंदर प्रस्तुति 

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