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मोहब्बत के फ़न कभी बिकते नहीं बाज़ारों में  इश्क के फूल अब  खिलते नहीं गुलनारों में बिखर गई है किसी राह में वफ़ा की खुशबु  वो गुंचे पहले से मिलते  नहीं  गुलबहारों में    एहसास जो रूहे जमीं से निकलते…

मोहब्बत के फ़न कभी बिकते नहीं बाज़ारों में 

इश्क के फूल अब  खिलते नहीं गुलनारों में


बिखर गई है किसी राह में वफ़ा की खुशबु 

वो गुंचे पहले से मिलते  नहीं  गुलबहारों में

 

 एहसास जो रूहे जमीं से निकलते थे कभी 

फ़कत  याद हैं अब ढलते नहीं अशआरों में 


वफ़ा के दरिया में अब  डूब के क्या करियेगा

वो दर्दे शरारे कभी दिखते नहीं तलबगारों में 


 कैसे बनाये कोई अपनी मोहब्बतों के महल

ताज से बिम्ब नहीं टिकते सभी  दीवारों में 


जिन पर नाज था  हिन्द की सल्तनत को 

वो जवाँ चेहरे अब दिखते नहीं अखबारों में


लगता  है  अब उनमे भी  बढ़ गई   दूरियां 

 परिंदे वो पहले  से  उड़ते नहीं  कतारों में  

              *****

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Comment by rajesh kumari on April 22, 2012 at 2:50pm

तहे दिल से शुक्रिया ले जाइए ,  सीमा जी प्रोत्साहित करने के लिए इतनी प्यारी प्रतिक्रिया ,और मुझे क्या चाहिए 

कृपया ध्यान दे...

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