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दो शब्द जीवन साथी से

सखी !

बस शब्द से कैसे

प्रकट तेरा करूँ आभार ?

 

क्या लिखूं ?

जिसमें समा जाए -

-नहाई देह की खुशबू

सुबह मेरी जो महकाती रही है !

-और होंठो की मधुर मुस्कान

जो बिखरी मेरे होंठो पे ऐसे खिलखिलाकर ,
भर गई मेरे ह्रदय में   

उष्णता अनमोल !

मरुथल में खिले जैसे

कुछ हँसी के फूल !

योग्य संभवतः नही पर

धन्य हूँ पाकर

दिए तुमने हैं जो उपहार !

सखी !

बस शब्द से कैसे

प्रकट तेरा करूँ आभार ?

 

ढूंढ कर लाऊं कहाँ से ?

शब्द ऐसे -

-जो तुम्हारे रात भर जागे नयन को

नींद का आराम दे दे !

-जो उनींदी उलझनों को

प्रात सी मुस्कान दे दे

क्या लिखूं मैं ?
जो तुम्हारे थकन को परिणाम दे दे !

और शक्ति दे कि तुम फिर

अन-थके दिन भर संभालो

आसमां का भार !
सखी !

बस शब्द से कैसे

प्रकट तेरा करूँ आभार ?

 

 

 

.......................................... अरुन श्री !

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Comment

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Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:07pm

आदरणीय सौरभ सर , रचना में इतनी कमियों के बाद भी आपके द्वारा रचना का इतना सुन्दर अनुमोदन आसमान की उचाईयों को छू लेने आभास कराता है ! लेकिन पैरों को जमीन से नही उखड़ने नही देता ! आभारी हूँ !
कुछ परिवर्तन किया है कविता में ! समय मिले तो देखिएगा ! सादर !

Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:03pm

सुरेन्द्र भ्रमर सर , मेरे भावो को आपने इतना मान दिया इसके लिए धन्यवाद ! सादर !

Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:02pm

वंदना मैम , सराहना हेतु धन्यवाद !

Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:01pm

महिमा श्री मैम , सराहना हेतु धन्यवाद , अच्छा लगा कि आपको मेरी इतनी पुरानी कविता याद है ! आभारी हूँ !

Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:00pm

दिव्या मैम , बहुत बहुत धन्यवाद ! साथ बनाए रखियेगा !

Comment by Arun Sri on April 23, 2012 at 12:00pm

सरिता सिन्हा मैम ,
वो फूल किसी और का था और ये सखी कोई और है !  क्यों बच्चे की पिटाई करवाना चाहती हैं ! :))) :))))))
आपको मेरी पुरानी कविता याद रही और आपने इतना अच्छा सुझाव दिया इसके लिए धन्यवाद ! आभारी हूँ !

Comment by Sarita Sinha on April 20, 2012 at 3:42pm

अरुण जी नमस्कार,

इतना असमंजस क्यूँ है?? वो किताब में से निकले हुए सूखे फूल दे दीजिये ना.....:-)
Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 9:01am

प्रणय भाव को बहुत खुब्सुअरती से उभारा है ...........

Comment by MAHIMA SHREE on April 19, 2012 at 10:43pm

बहुत -२ बधाई आपको ..  श्रृंगार रस से भरी ,ह्रदय के कोमल भावो से सजी, हमे भाव विभोर करती रचना के लिए  ..

लगता ही नहीं की ये वही "कहो मानव" का गुस्सैल नायक है :)

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 17, 2012 at 11:39pm

क्या लिखूं ?

जिसमें समां जाए

नहाई देह की खुशबू ,

और तेरे होठ की मुस्कान जो

होठ पर मेरे बिखरकर ,

भर दिया जीवन में मेरे  

उष्णता अनमोल !

मरुथल को दिया जैसे

कुछ हँसी के फूल !

प्रिय अरुण जी अच्छी चाह ..स्नेहाशिक्त रचना  .भाव प्रणय  से रमी हुयी .....जय श्री राधे 

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