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(प्रस्तुत रचना 'सार' छन्द पर आधारित है।इसके अनुसार छन्द के प्रत्येक चरण में 28 मात्रायें होती हैं,16वीं तथा 12वीं मात्रा पर यति होती है।चरणान्त में दो गुरु अवश्य होने चाहिए।)

जीवन का आधार कहां है,आफत सिर पर भारी।
अपने में ही लिप्त घूमती,पागल दुनिया सारी॥
समय नहीं है पास किसी के,जीवन भागा दौड़ी।
प्यार-व्यार का रिश्ता झूठा,नफरत दरिया चौड़ी॥
कहां बची है वही मनुजता,मानव कहां पुराना।
और अधिक विकसित है दुनिया,मार्डन हुआ जमाना॥
वृद्धों का सम्मान कहां है,छूकर चरन नमस्ते।
हाय किये बाइक पर बैठे,पब या क्लब के रस्ते॥
दादा-दादी की परी-कथा,पोता कहे पुरानी।
साबू नागराज के आगे,फीकी सभी कहानी॥
परमाणू के हाथ सृष्टि है,यदि विस्फोट कहीं हो।
क्षणभर में सोने की नगरी,मिटकर धूल मिली हो॥
जीवन बंदूकों में बसता,प्राण समझ लो गोली।
किस गोली पर मौत लिखी हो,रब जाने या गोली॥
पैसा पैसा औ बस पैसा,पैसा सब पर भारी।
पैसे के खातिर सब करते,बिन अच्छा भला विचारी॥
ऐसा विकास इस दुनिया का,जाने कहां रुकेगा।
बम फूटे या धरती पलटे,ईश्वर रूप धरेगा॥

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 15, 2012 at 9:35am
रचना की सराहना हेतु हार्दिक आभार अश्विनी जी।
Comment by अश्विनी कुमार on April 15, 2012 at 9:00am

विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी अति सुंदर शिल्पब्द्ध प्रवाहमयी काव्य हेतु हार्दिक बधाई 

वृद्धों का सम्मान कहां है,छूकर चरन नमस्ते।

हाय किये बाइक पर बैठे,पब या क्लब के रस्ते॥,,,,,.........     हार्दिक आभार

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 15, 2012 at 7:06am
आभार आदरणीय कुशवाहा जी।
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 14, 2012 at 11:00pm

bahut sundar bhavon ko piroya hai, badhai.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 4:28pm
आदरणीय अभिनव जी!आपकी सराहना मेरे लिए अमूल्य है।इस कृपा के लिए हार्दिक आभार।
Comment by Abhinav Arun on April 14, 2012 at 12:56pm

एक प्राचीन छंद में नूतन चित्रों का समावेश करने में सफलता मिली है आपको हार्दिक बधाई इस रचना पर !!

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 5:00am
गुरुदेव को प्रणाम।प्रयास पर आपकी उपस्थिति सादर अपेक्षित एवं प्रतीक्षित थी।मनोकामना पूर्ण हुई।
सादर आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 4:56am
आदरणीय मृदु जी प्रयास को सराहने हेतु हार्दिक बधाई।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 14, 2012 at 3:09am

अप्रचलित छंदों को सामने लाने केलिये धन्यवाद, विन्ध्येश्वरी प्रसाद जी.  इन प्रयासों को अवश्य ही कसौटी मिले.

रचना का कथ्य वस्तुतः रचनाकार की सामयिक चिंता का प्रतिबिम्ब है. बधाई.

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 13, 2012 at 9:03pm

अपने में ही लिप्त घूमती,पागल दुनिया सारी॥ यथार्थ की अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें सर 

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