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मोबाइल घर

(दोस्तों हम लोगों की एक जमात से बन गयी है जहाँ एक कवि लिखता है और दूसरा पढता है मंझे हुए कवि मंझी हुई कविता  सब कुछ एकदम प्रोफेशनल मगर कोई स्थिति जिसको आप ने देखा हो और आपके दिल में अन्दर तक उतर गयी हो उस विषय पर जब आप लिखते हैं तो बात कुछ और ही होती है .  ऐसी ही परिस्थिति में मैंने घनघोर वारिश में जब कुछ झोपड़ियों को जलमग्न होते देखा तो उस रात न तो उन झोपड़ियों में रहने वाले लोग सोये और न मै खुद सो पाया और उस रात जो मुझसे कविता वन पड़ी वोह मै आप सबके समक्ष रख रहा हूँ तो आप लिखी हुई और भोगी हुई कविता का फर्क महसूस कीजिये.)


कल महसूस किया मैंने  कुछ दरकते हुए.

एक घर, जिसे लोग कहते है अचल संपत्ति 

मैंने देखा है उसे कुछ दूर तक सरकते हुए.


छोटे बच्चों को देखा है  कंपकंपाते हुए .

रात भर घनघोर वारिश में भीग जाते हुए.

 ऐसी वारिश जिसने उन्हें वेकल बना डाला 

उनके झोपड़े को एक जल महल बना डाला

एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता था .

घर का सामान वहां नाव सा  उतराता था .


अपने ही हांथो से घर अपना ही उजाड़ना पड़ा.

और थोड़ी ही दूर पर सूखे में तम्बू गाड़ना पड़ा .


कल भी यदि वारिश रही तो यह कहाँ जायेंगे ?.

अपनी तकदीर से लड़ते हुए .

क्या यह अपने घर को मोबाइल बना पाएंगे ?....... 

क्या यह अपने घर को मोबाइल बना पाएंगे ?....... 


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Comment

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Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 15, 2012 at 2:47pm

श्रीमान मुकेश जी, बाढ़ का  मंज़र उपस्थित हो गया आँखों के सामने. मेरी पूरी संवेदना है जिस पर रचना लिखी गई है.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 15, 2012 at 12:10pm

सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति. बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 14, 2012 at 10:18pm

आदरणीय मुकेशजी, आपकी संवेदना को सलाम.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2012 at 9:11pm
सत्य है सर।जो लोग इस स्थिति में होते होगें शायद वे जीवन से भी निराश हो चुके होगे।उनके लिए जीवन ही मृत्यु समान हो चुका होगा।आपने ऐसे लोगों के दर्द को बखूबी बयान किया है स्वागत है।
Comment by charnjit mann on March 14, 2012 at 8:48pm

khoobsoorat aur hasaas kavita

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