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शब्द चुप से हैं ,कुछ अरसे से..
मन है व्याकुल सा  ,भाव तरसे से ..
घुमड़ते हुए से बादल बरसते ही नहीं  ..
जाने क्या देखते हैं नयन सूने से ...
हूक सी हैं कहीं उठती दिल में ..
चीख बन कर के बिखर जाती है..
पर शिकन भी नहीं चेहरे पे ज़रा..
आग सीने में ,ख्वाब हैं उजड़े से..
मारते क्यों मुझे पत्थर से ज़माने वाले..
मेरे मरने से क्या हैं वो सुधरने वाले ?
चमन जलाते हैं जो वो पूजे जाते हैं..
झूंठ के साए में आज सच भी हुए बौने से ....
खोखली सी हंसी हँसते हैं सजावट के लिए ..
या तो पाज़ेब बजाते हैं आहट के लिए ..
एक विरानगी खुद में ही लिए चलते हैं..
रहे दीयों  की रौशनी में अमावस जैसे ..

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Comment

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Comment by Lata R.Ojha on November 1, 2011 at 3:29pm
aabhaar Satish Mapatpuri ji :)
Comment by satish mapatpuri on November 1, 2011 at 2:26am
मारते क्यों मुझे पत्थर से ज़माने वाले..
मेरे मरने से क्या हैं वो सुधरने वाले ?

अति सुन्दर ............... बधाई हो लताजी

Comment by Lata R.Ojha on October 31, 2011 at 2:54pm

bahut bahut dhanyvaad Arun ji :)

Comment by Abhinav Arun on October 31, 2011 at 12:59pm

Man ki vyatha ko in sashakt kaavy panktiyon men bahut khoobsurati se ukera hai aapne .hardik badhai is rachna ke liye aapko Adarniya Lata Ji >

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