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फागुनी दोहे " होली 2013 " -

दस फागुनी दोहे  " 2013 "

तेरी ही खातिर सजे रंग अबीर के थाल ,
तेरे आने से हुई मेरी होली लाल ।

रंग पर्व में घुल गए इंतज़ार के रंग ,
होली सच में शोभती अपनों के ही संग ।

सरसों टेसू और पलाश हैं बसंत के दूत ,
रंग रूप से कर रहे मादकता आहूत ।

लज्जा तेरा रंग है मेरा रंग संकोच ,
ऐसे में कैसे मने होली तू ही सोच ।

मुझको अब भी याद है वो होली वो फाग ,
तन पर रंग था प्रीत का मन में प्रीत की आग ।

माँ तेरे हाथों बनी गुझिया का वो स्वाद ,
लगता हरपाल साथ है तेरा आशीर्वाद ।

पिचकारी थी पांच की दस पैसे का रंग ,
दिनभर हम भी गाँव में करते थे हुडदंग ।

कहाँ पुलक उत्साह है कहाँ आपसी स्नेह ,
शहरों में हम ढो रहे अपनी छूछी देह ।

                           - अभिनव अरुण
                              {25032013}

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Comment by राजेश 'मृदु' on March 25, 2013 at 12:48pm

सुंदर दोहे, होली के लगभग सभी रंग को आपने इसमें समेटा है, सादर

Comment by ram shiromani pathak on March 25, 2013 at 11:44am

आदरणीय अभिनव जी बहुत सुन्दर!बधाई स्वीकारें।

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 10:41am
//कहाँ पुलक उत्साह है कहाँ आपसी स्नेह ,
शहरों में  हम ढो रहे अपनी छूछी देह । //
अभिनव जी बहुत सुन्दर! यह दोहा विशेष तौर पर! बधाई स्वीकारें।
Comment by Abhinav Arun on March 25, 2013 at 10:34am

आदरणीय , एडमिन जी , दो दोहों के   बीच स्पेस नहीं बन पा रहा मैंने काफी प्रयास किया था , यदि संभव हो तो कृपया देख लें । सादर अग्रिम आभार सहित  !!

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