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Hardam Singh Maan
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Hardam Singh Maan's Blog

ग़ज़ल

कैसी बहार यह आई मेरे शहर अंदर,

हर कली मुरझाई मेरे शहर अंदर.



खून सफ़ेद हुआ है रिश्ते नातो का,

किस ने ज़हर पिलाई मेरे शहर अंदर.



दूर आप क्या हुए जैसे हर तरफ,

तन्हाई तन्हाई मेरे शहर अंदर.



हम साए का साया नज़र नही आता,

हो गयी पीर पराई मेरे शहर अंदर.



प्यार के बादल उड़ कर कहाँ चले गये,

नफ़रत की घटा है छाई मेरे शहर अंदर.



आँसू पीड़ा दर्द की सौगात नयी,

हर मानव ने पाई मेरे शहर अंदर.



हर पल रोशन करने की वह बात… Continue

Posted on October 24, 2010 at 8:00pm — 3 Comments

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At 10:01pm on October 20, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 8:31am on October 20, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:18pm on October 6, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

At 5:25pm on October 6, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 5:24pm on October 6, 2010, Admin said…

 
 
 

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