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आज का परिवार

धीरे  धीरे  इस  तरहा  बदला  घर  का हाल!

पहले  दिल  मे  फिर  उठी आँगन मे दीवार,

 

घर के खुशियो को लगा जाने किस का श्राप!

खेत  बाते  घर  बता  और  बाते  मा  बाप,

 

पहले दिल मे प्यार था! फिर आया  अभिमान,

टकराए  अभिमान  तो  घर  हो  गया  मकान,


मा  उस  को  दोषी  काहु  वो  दे  मुझे को दोष!
हम  हिस्सा  तो  पा  गये  किया  पाया संतोष,


 मुखिया  चिंता  मे  पड़ा!  हुए  कहा पर भूल!
पेड़   लगया   आम   का   केसे   हुई  बबूल,


घर  पिंजरे  सा  लग  रहा! म्न मे उठता शोर!
चलो चलो अब उड़ चले   हम  जंगल की और,


घर  को   कही    ना  बटना   टूटेगा   परिवर!
अगर   बटना   चाहे  तो  हम  बातेगे   प्यार.

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