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घर का लुक (लघुकथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

“अरे गुप्ता जी, ये क्या कर रहे हैं आप ?”

“बेटे के स्कूल में पर्यावरण दिवस पर एक नाटक है.. और उसको एक पेड़ बनना है.. इसीलिये ये डालियाँ काट-काट कर उसे दे रहा हूँ.”

“आपने तो इसे पूरा ही काट डाला.. अब तो ये कायदे का पेड़ बनने से रहा. अभी-अभी तो वन विभाग वालों ने इसे लगाया था..”

“भाईजी, सामने से घर का लुक भी खराब कर रहा था, इसी बहाने इसका काम तमाम करूँ..” - बुदबुदाते हुये गुप्ता जी के हाथ और तेज चलने लगे. 

(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 3:38am

आदरणीय शुभ्रांशु जी, पर्यावरण के महत्त्व को समझने और समझाने का ढोंग करने वालों की दशा और दिशा पर करारा व्यंग्य करती सार्थक और सफल लघुकथा हुई है. निसंदेह लघुकथा अपने मर्म को पूरी सघनता से अभिव्यक्त करती है और पाठक को गहरे तक प्रभावित करती है. इस शानदार प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 18, 2015 at 11:43pm

उथलापन और दिखावा व्यक्तित्व का ही हिस्सा हो गया है. घर क् लुक के लिए जीवनी-शक्ति को नोंचना इसी बात का पर्याय है. शुभ संदेश देती एक अच्छी लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई, भाई शुभ्रांशु.
शुभेच्छाएँ

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:41pm

आदरणीय गिरिराज जी, 

रचना के लिये एक अलग बिम्ब के साथ बधाई देने के लिये आभार.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:40pm

आदरणीय मोहन जी. 

रचना के मर्म को समझने के लिये धन्यवाद.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:39pm

आदरणीय जितेन्द्र जी, 

मेरी रचना आपको पसंद आयी इस बार के लिये बहुत आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:37pm

आदरणीय maharshi tripathi जी, 

कथा पर आने के लिये धन्यवाद.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:28pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी, 

आज हम वास्तविकता से दूर प्रस्तुती को ही विशेष महत्व देते हैं रचना पर आने के लिये घन्यवाद.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:22pm

आदरणीय विनय जी, 

आपके विचार का आकांक्षी रहता हूँ.

यही इस मंच की यही खुबसूरती है कि यहाँ बेबाकी से आप अपनी बात रख सकते है. सीखने सिखाने की प्रक्रिया सतत चलती रहती है. किसी रचनाकार से एक स्तरीय रचना की उम्मीद, रचना कर्म को और रचना कार को जिम्मेदारी का अहसास कराती है. आपकी बातों पर विशेष ध्यान रखूँगा.

सादर.

 

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:16pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी, 

रचना को मान देने के लिये घन्यवाद.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 1:15pm

आदरणीय कॄष्ण मिश्रा जी, 

रचना पर आने के लिये घन्यवाद. सही कहा आपने पर्यावरण दिवस पर अपने हिसाब से एक रचना डाली थी. 

सादर.

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