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ग़ज़ल - निर्मल नदीम

गिरा के अपनी ही आँखों से खून काग़ज़ पर,
तलाश करता रहा दिल सुकून काग़ज़ पर.


जला के खाक ही कर दे जहान को आशिक़,
अगर उतार दे अपना जुनून काग़ज़ पर..

ग़ज़ल का एक भी मिसरा नहीं कहा मैनें,
थिरक रहा है किसी का फुसून काग़ज़ पर.

कहीं ये अक्स - ए- तमन्ना ही तो नहीं तेरा,
उभर के आया है जो सर निगून काग़ज़ पर..

तमाम रात की तन्हाइयों से छूटा तो
तड़प उठा है वफ़ा का जुनून काग़ज़ पर..

"नदीम" को भी बुलाना अदब की महफ़िल में,
सजा के लाता है दर्द - ए - दुरून काग़ज़ पर..


निर्मल नदीम (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Nirmal Nadeem on February 25, 2015 at 10:26pm
आदरणीय गिरिराज भण्डारी साहब शुक्रिया। ये ग़ज़ल उस्ताद की इस्लाह के साथ पेश किया हूँ। और ये प्रयोग नया ज़रूर है लेकिन ग़लत नहीं। शुक्रिया आपका
Comment by Nirmal Nadeem on February 25, 2015 at 10:24pm
मिथिलेश जी शुक्रिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 9:58pm

आदरणीय निर्मल नदीम भाई , 

गिरा के अपनी ही आँखों से खून काग़ज़ पर,
तलाश करता रहा दिल सुकून काग़ज़ पर.  --- खूब सूरत मतला हुआ है , बाक़ी अश आर भी बढिया हैं आपको दिली बधाइयाँ ॥ 

बस एक बात कहना चाहता हूँ -- फुसून और  निगून शब्द  मुझे सही नहीं लग रहे हैं , सही शब्द फुसूँ और निगूँ  हैं , एक बार सोच लीजियेगा , नहीं तो आपके दोनो शे र गलत काफिया के कारण खारिज हो सकते हैं । 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 9:21pm

आदरणीय निर्मल नदीम जी आपकी किसी पहली ग़ज़ल से गुज़र रहा हूँ, बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है, दिल से दाद कुबूल फरमाए 

कृपया ध्यान दे...

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