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स्नेह की छाँव (लघुकथा)

" बेटा, तुम जब भी शहर से आते हो तो घर में कम और इस पेंड़ के पास ज्यादे समय बिताते हो, घर में मन नही लगता क्या..."

" चाचा, यहाँ बड़ा सुकून मिलता है! याद है आपको जब मैं नर्सरी में पढता था! एक बार वहाँ पौधशाला वाले पौधे बाँट रहे थें, ये आम का पेंड़ मैं वहीं से लाया था, पिता जी पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर बहुत खुश हुए थें!  इसे उन्होने अपने हाथों से लगाया था और खाद-पानी भी समय-समय से दिया करते थें! इसे वे बहुत प्यार करते थें,  इसीलिए कुछ पल इसकी छाया में बिताना, पिता जी के स्नेह की छाँव में रहने जैसा लगता है ...."

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by Pawan Kumar on October 31, 2014 at 10:18am

आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डे जी सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार!

Comment by Shubhranshu Pandey on October 28, 2014 at 11:22am

वरद् हस्त....

सुन्दर कथा..

Comment by Pawan Kumar on October 16, 2014 at 3:48pm
आदरणीय नीरज भईया सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार!
Comment by Neeraj Nishchal on October 15, 2014 at 10:49pm
बहुत सुँदर
Comment by Neeraj Nishchal on October 15, 2014 at 10:49pm
बहुत सुँदर
Comment by Neeraj Nishchal on October 15, 2014 at 10:48pm
बहुत सुँदर
Comment by Pawan Kumar on October 13, 2014 at 4:28pm

आदरणीय श्याम नरायन वर्मा जी सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार।

Comment by Pawan Kumar on October 13, 2014 at 4:28pm

आदरणीया मीना पाठक जी सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार।

Comment by Pawan Kumar on October 13, 2014 at 4:28pm

आदरणीय डा0 गोपान नरायन श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, मार्गदर्शन एवं प्रशंसा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by Pawan Kumar on October 13, 2014 at 4:27pm

आदरणीय  chouthmal jain   जी सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार।

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