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गजल [सरिता भाटिया]

दिलों को जो सुहाते हैं /
दिलों पे जाँ लुटाते हैं /

निगाहों से क़त्ल करके
मुझे कातिल बनाते हैं /

दिलों के हैं अजब रिश्ते
सदा अपने निभाते हैं /

यूँ पल पल मर रही हूँ मैं
मुझे जिन्दा बताते हैं /

सभी अपने तुम्हारे बिन
मुझे जीना सिखाते हैं /

सुना है ऐसे में अपने
भी दामन छोड़ जाते हैं /

.....................................

..मौलिक व् अप्रकाशित....

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Comment

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Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 10:20am

हार्दिक आभार आशीष भाई 

Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 10:20am

शुक्रिया राहुल 

Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 10:20am

आदरणीय अरुण जी हार्दिक आभार 

Comment by vandana on January 22, 2014 at 6:47am

दिलों के हैं अजब रिश्ते 
सदा अपने निभाते हैं....वाह बहुत सुन्दर आदरणीया सरिता जी 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 22, 2014 at 12:07am

यूँ पल पल मर रही हूँ मैं 
मुझे जिन्दा बताते हैं /  वाह, बहुत खूब !!

Comment by Arun Sri on January 21, 2014 at 10:46am

बढ़िया प्रयास हुआ है गज़ल का !

Comment by Sarita Bhatia on January 21, 2014 at 10:14am

आदरणीया कुंती दीदी हार्दिक आभार ,स्नेह यूँहीं बनाये रखें |

Comment by Sarita Bhatia on January 21, 2014 at 10:13am

आदरणीय गिरिराज जी हार्दिक आभार 

Comment by coontee mukerji on January 21, 2014 at 1:26am

सभी अपने तुम्हारे बिन
मुझे जीना सिखाते हैं /.....बहुत खूब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 20, 2014 at 10:28pm

आदरणीया सरिता जी , शानदार ग़ज़ल हुई है , आपको तहे दिल से बधाइयाँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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