For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक बंजर व्योम तो हम पर तना है !

अपरिचय, संवेदना है, भावना है ,

उसे क्या जो पुष्प से पत्थर बना है !

मिले उनको हर्ष के बादल घनेरे ,
एक बंजर-व्योम तो हम पर तना है !

चित्र है उत्कीर्ण कोई चित्त पर ,
ठहर जाती जहां जाकर कल्पना है !

सूर्य की ये रश्मियाँ बंधक बनीं हैं 
एक अंधी कोठरी मे ठहरना है !

रास्ते अब स्वयं ही थकने लगे हैं 
पूछता गंतव्य मन क्यों अनमना है ?

_______________________प्रो. विश्वम्भर शुक्ल 

 (मौलिक और अप्रकाशित )


Views: 705

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 10:37pm

इसी नाम से छंद है गीतिका. आप जानते ही हैं आदरणीय. खैर ..

इस मंच पर पहले भी कई-कई बार इन विन्दुओं पर यानि गीतिका को लेकर परिचर्चा हो चुकी है. और सार्थक उत्तर कभी नहीं मिल पाया है.

आप मेरे कहे का बुरा न मानें, आदरणीय तो कहूँ.  कि, मात्रिकता और वर्णिक स्वरूप के हिसाब से रचना विधान भी सधना चाहिये. फिर तो इसे कविता ही रहने दें जो शब्द-संयोजन के हिसाब से चलती है और गेयता का अत्यंत संतुष्टिदायक निर्वहन करती है. हम फिर ग़ज़ल के आवरण को क्यों ढोयें ? किसी बड़े नाम ने कोई प्रयोग किया तो वह प्रयोग अनुमन्य ही हो ऐसा हर बार नहीं होता. वह भी तब जब उस प्रयोग के कई विधान सम्बन्धी तथ्य प्रश्नवाचक घेरे में हों.

ग़ज़ल के आवरण से हटते ही सारे भ्रम दूर हो जायेंगे. उर्दू अदब मे भी कई-कई नामचीन ग़ज़लकार बेबह्र ग़ज़लें कहते हैं लोग उन्हें जानते भी हैं.  लेकिन हिन्दी में ऐसी परिपाटी नये रचनाकारों को भ्रम में डालती है और कहने वालों को हिन्दी ग़ज़लकारों के विरुद्ध मौका. 

दूसरे, जब हम छंद शास्त्र और उसके दुरूह विधान साध सकते हैं तो फिर हिन्दी वर्णमाला के आलोक में ग़ज़ल क्यों नहीं ? क्यों अनावश्यक बैसाखी का सहारा लिया जाय ? ग़ज़ल से सम्बन्धित आलेख और रिपोर्ट आप भी अवश्य पढते होंगे.

मेरा इतना ही निवेदन है.

सादर

Comment by रविकर on July 2, 2013 at 7:58pm

विमर्श से सौ प्रतिशत सहमत-
सुन्दर गीतिका-

Comment by रविकर on July 2, 2013 at 7:56pm

बना अनमना थका सा, हुआ भावना सून |
वाह वाह क्या बात है, पत्थर मन मजमून ||

आभार आदरणीय डाक्टर साहब ||
बधाईयाँ इस निर्दोष प्रस्तुति पर-

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:52pm

बंधुवर  Ram Shiromani Pathak जी आपका ह्रदय से आभार !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:50pm

अमन कुमार जी सादर सस्नेह आभार आपका 

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:50pm

गीतिका 'वेदिका'जी आपकी सराहना की टिप्पणी का सस्नेह आभारी हूँ ,वंदन !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:49pm

मित्र अरुण शर्मा 'अनंत' जी से क्षमा ,आभार व्यक्त करते समय पूरा नाम टंकित होने से रह गया 

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:47pm

मित्रवर अरुण कुमार 'अनंत' जी आपकी स्नेहिल दृष्टि का आभार !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:44pm

आपका हार्दिक आभार सप्रेम वीनस केसरी जी !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 2, 2013 at 4:43pm

आभार मित्र Jitendra Pastariya JII !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर…See More
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"समसामयिक विषय है ये। रियायत को ठुकराकर अपनी काबलियत से आगे बढ़ना अच्छा है,पर इतना स्वाभिमान कम ही…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब। हार्दिक स्वागत आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। समसामयिक और सदाबहार विषय और मुद्दों पर सकारात्मक और…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service