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मत्त गयंद (सवैया): संजीव 'सलिल'

मत्त गयंद (सवैया):
संजीव 'सलिल'
*
मत्त गयन्द सुछन्द  मनोहर, ज्यों गुलकंद मधुर मन भाया
आत्मज सम यश-कीर्ति बढ़ा, कवि-तात का लाड़ निरंतर पाया
झूम उठे थे शेष न शेष रहा धीरज, जब छंद सुनाया.
घबराये नर-नार कहें, क्यों इंद्र ने भू पर वज्र चलाया..
*

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Comment by upasna siag on January 24, 2013 at 3:51pm

सुन्दर अभिव्यक्ति .......

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 22, 2013 at 4:12pm
आदरणीय संजीव सर जी सादर प्रणाम 
भाव पक्ष के लिए आपको साधुवाद 
आदरणीय गुरुदेव के कहे से सहमत हूँ 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 21, 2013 at 11:55pm

आदरणीय आचार्यजी, तीसरे और चौथे पद की प्रस्तुति के समय संभवतः कुछ गड़बड़ हुआ है. कृपया, शुद्ध पदों को पुनः पोस्ट करें.

सादर

कृपया ध्यान दे...

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