दोहा सप्तक. . . . . . विविधकभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।सुलझेंगे उलझे हुए, अंतस के हालात ।।खामोशी से पूछिए, क्या है उसका दर्द ।किन राहों की है भरी, उसमें इतनी गर्द ।।लफ्ज अकेले हो गए, ठहर गए जज्बात ।कोई अपना दे गया, दिल को वह आघात ।।हुई उम्र तो सामने, उभरी हर तस्वीर ।रुखसारों पर दर्द की,…
दोहा पंचक. . . . . अधरअधरों को अभिसार का, मत देना इल्जाम ।मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम । जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।स्पर्शों के दौर…
आत्म मुग्ध मदारी--------------------------------------बजा रहे डुगडुगीनाच रहे बन्दरसैंकड़ों ,हज़ारोंसम्मोहित बंदरअरबों खरबों तमाशबीनदेख रहे तमाशापीट रहे तालियाँसम्मोहित तमाशबीनमदारीउगाह रहा दाननितांत निजी झोली मेंएक एक के पास जानज़रें मिलाध्यान से देखपहचान बनाकभी फुसलाकभी बहलाकभीक्रोधित लाल आँखे दिखाएक…
भ्रम सिर्फ बारी का है************************************बरसों बरस लगेबीज को बहलाने मेंभरपूर दरखत बनाने मेंबरसात नहलाती रहीधूप सहलाती रहीहवा आती रहीहवा जाती रहीबरसों बरस लगे धरा कोजड़ो की जगह बनाने मेंबीज को दरख्जत बनाने मेंऔर तुमसंवेदनहीन शिकारी आएताज की कुल्हाड़ी लायेऔर बरसों के पाले दरख़्त का पलों…
बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें******************************बेगुनाही औरइन्साफ कीबात क्यों सोचती हैं ये औरतेंचुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जाती ?अस्मिता औरसवाल उठाने कीबात क्यों सोचती हैं ये औरतेंचुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जाती ?अंधे ताज औरविवेक तर्क कीबात क्यों सोचती हैं ये औरतेंचुपचाप गांधारी बन…
निर्वाण नहीं हीं चाहिए---------------------------कैसा लगता होगाऊपर से देखते होंगे जबमाँ -बाबाकि जिसमुकाम मकान दुकानखानदान के नाम कोकमाने मेंसारी उम्र लगाईपाई पाई बचाईखुली खुशीसंतति को थमाईसंग मेंथमा दिएविरासत से मिलेसारे उपहारसंस्कारतीज त्यौहारज़मीन व्यापाररात दिनसप्ताह सालसपनो के घरौदे सब घरबारवही…
दोहा सप्तक. . . . . युद्धहरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।बेबस जनता भोगती , इसका हर अंजाम ।।दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।खण्डहरों के ढेर पर, सब…
ग़ज़ल 2122 1212 22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बातीपास उनके जो सुनहरा दिल हैताज इक सब के मन के अंदर भीऔर ये शह्र आगरा दिल हैदिल लगी दिल्लगी नहीं होतीइक ग़ज़ब का मुहावरा दिल हैदेखकर उनकी मदभरी आँखेंखो गया मेरा मदभरा दिल हैयाद मुद्दत से वो नहीं है…
२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। * कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२। * कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३। * रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी साजन को देख…
दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज । जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।। जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग । घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।। बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम । छोटे आते जाल में, बड़े…