by रवि भसीन 'शाहिद'
yesterday
दावतनामा हमको आया एक मुशायरे में शिरकत का
जिस में अपनी शायरी पढ़ना बाइस था बेहद इज़्ज़त का
किया इरादा हमने उसी दिन ग़ज़लें पुरानी नहीं पढ़ेंगे
जाएंगे उस महफ़िल में तो ताज़ा सुख़न ही पेश करेंगे
नई ग़ज़ल लिखने की ठानी भूल के सारे काम थे जितने
कलम दवात रजिस्टर लेकर बैठ गए हम मतला लिखने
बैठे रहे घंटों कुर्सी पर अपना पूरा ध्यान लगाया
छत पे सैर भी की हमने और लफ़्ज़ों को भी ख़ूब घुमाया
वफ़ा मुहब्बत हिज्र इबादत मौज़ूआत कई ज़ेहन में आये
रहे मुन्तज़िर कब जागे अंदर का शायर रंग में आये
लेकिन कभी कभी क़ुदरत भी अपना नूर नहीं बरसाती
हैराँ होकर सोच रहे थे ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
सारे शेर पढ़े अपने भी औरों की ग़ज़लें भी खंगाली
कड़ी मशक़्क़त में सिगरेट की दस डिबियाँ ख़ाली कर डाली
कोई हसीन ख़याल जो सूझा मिसरे से मिसरा टकराया
और तुकबंदी की काविश में कुछ भी अपने हाथ ना आया
दो मिसरे भी कह नहीं पाए कितना भी सर को खुजलाया
बहुत कोशिशें कीं बंदे ने मतला मगर नहीं हो पाया
दफ़्तर में अब दिल ना लगे और घर आ कर भी जी घबराए
काटने को कमरा दौड़े अब करें तो आख़िर कौन उपाय
खोये खोये से रहने लगे और जीना लगे बिलकुल बेमानी
किसी से ना मिलना चाहें और सोचें दुनिया तो है फ़ानी
क़िस्मत इस मिस्कीं शायर पे मेहर-ओ-नाज़ नहीं फ़रमाती
शायर इस सदमे में है कि ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
कॉलेज के दिन याद किये जब शौक़-ए-शायरी शुरू हुआ था
ज़ेहन पे नक़्श है वो लम्हा जब हमने पहला शेर कहा था
निकल पड़ा तख़लीक़ का दरिया शेर पे शेर बनाया हमने
लूटे कई मुशायरे महफ़िल महफ़िल नाम कमाया हमने
छोड़ रिवायत ग़ज़ल में एक नया ही रंग जमाया हमने
सुख़नवरी के हुनर को नई बुलंदी पर पहुँचाया हमने
ऐसे ऐसे शेर कि मीरो-ग़ालिब भी फीके पड़ते थे
लोग दीवाने थे अपने और सब शायर हमसे जलते थे
अपनी शायरी पर लानत जो कभी किसी का शेर चुराया
नई रदीफ़ ज़मीनें दे इस फ़न को और अज़ीम बनाया
किसकी नज़र लगी है शायरी क्यों हमसे है आँख चुराती
कब से परेशाँ सोच रहे हैं ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
बीवी के जो पास मैं बैठा उसने मुझको ये समझाया
मेरी तबीयत ठीक नहीं है मुझपे है कोई भूत का साया
कई दिनों से सोया नहीं हूँ ढंग से खाना भी नहीं खाया
शायर सब अहमक़ होते हैं वक़्त अपना करते हैं ज़ाया
कौन उसे अब ये समझाए कितना ज़रूरी काम है मेरा
इल्म-ओ-अदब के गलियारों में कितना रौशन नाम है मेरा
कितना हिस्सा डाल रहा हूँ नई नस्ल की तरबीअत में
सर्फ़ किया है जीवन सारा मैंने उर्दू की ख़िदमत में
मुल्क-ओ-क़ौम के नाम मुहब्बत और अम्न पैग़ाम है मेरा
दुनिया को इतना कुछ देकर क्यूँ फिर ख़ाली जाम है मेरा
कोरे पन्नों का कोरापन कोई तरकीब नहीं भर पाती
इतने बड़े शायर को आख़िर ताज़ा ग़ज़ल अब क्यों नहीं आती
दिल को करके सख़्त किया तय आख़िर कुछ तो हल करते हैं
सोचा कोई ग़ज़ल लेकर उसमें कुछ रद्दो-बदल करते हैं
अपनी अलमारी को फरोला बाहर निकालीं डायरियां सारी
वालिद की इक डायरी में मिल गई हमें कुछ उनकी शायरी
पन्ने उलट पलट कर हमने ग़ज़ल चुनी उसमें से अधूरी
उसकी रदीफ़ ज़रा बदली और जुटे उसे करने में पूरी
क़ाफ़िया लिया सुहूलत वाला बहर ना लम्बी और ना छोटी
इक इक शेर पे मेहनत करके उनको हमने बनाया मोती
कुछ असरात फ़िराक़ के फिर कुछ ज़ौक़ और मोमिन के झलकाये
और करिश्मे अपने तख़य्युल और तग़ज़्ज़ुल के भी दिखाए
मात खा गए मक़्ते में जब कहीं तख़ल्लुस घुस नहीं पाया
शुक्र किया हुई ग़ज़ल मुक़म्मल हमने ना उस पे ज़ोर लगाया
शायरी से ‘शाहिद’ की तौबा ऐसी बला से हम बाज़ आये
लौट आये घर को बुद्धू और जान बची सो लाखों पाए
(मौलिक व अप्रकाशित)
Cancel
हादिसाते-शायरी (नज़्म) – रवि भसीन 'शाहिद'
by रवि भसीन 'शाहिद'
yesterday
दावतनामा हमको आया एक मुशायरे में शिरकत का
जिस में अपनी शायरी पढ़ना बाइस था बेहद इज़्ज़त का
किया इरादा हमने उसी दिन ग़ज़लें पुरानी नहीं पढ़ेंगे
जाएंगे उस महफ़िल में तो ताज़ा सुख़न ही पेश करेंगे
नई ग़ज़ल लिखने की ठानी भूल के सारे काम थे जितने
कलम दवात रजिस्टर लेकर बैठ गए हम मतला लिखने
बैठे रहे घंटों कुर्सी पर अपना पूरा ध्यान लगाया
छत पे सैर भी की हमने और लफ़्ज़ों को भी ख़ूब घुमाया
वफ़ा मुहब्बत हिज्र इबादत मौज़ूआत कई ज़ेहन में आये
रहे मुन्तज़िर कब जागे अंदर का शायर रंग में आये
लेकिन कभी कभी क़ुदरत भी अपना नूर नहीं बरसाती
हैराँ होकर सोच रहे थे ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
सारे शेर पढ़े अपने भी औरों की ग़ज़लें भी खंगाली
कड़ी मशक़्क़त में सिगरेट की दस डिबियाँ ख़ाली कर डाली
कोई हसीन ख़याल जो सूझा मिसरे से मिसरा टकराया
और तुकबंदी की काविश में कुछ भी अपने हाथ ना आया
दो मिसरे भी कह नहीं पाए कितना भी सर को खुजलाया
बहुत कोशिशें कीं बंदे ने मतला मगर नहीं हो पाया
दफ़्तर में अब दिल ना लगे और घर आ कर भी जी घबराए
काटने को कमरा दौड़े अब करें तो आख़िर कौन उपाय
खोये खोये से रहने लगे और जीना लगे बिलकुल बेमानी
किसी से ना मिलना चाहें और सोचें दुनिया तो है फ़ानी
क़िस्मत इस मिस्कीं शायर पे मेहर-ओ-नाज़ नहीं फ़रमाती
शायर इस सदमे में है कि ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
कॉलेज के दिन याद किये जब शौक़-ए-शायरी शुरू हुआ था
ज़ेहन पे नक़्श है वो लम्हा जब हमने पहला शेर कहा था
निकल पड़ा तख़लीक़ का दरिया शेर पे शेर बनाया हमने
लूटे कई मुशायरे महफ़िल महफ़िल नाम कमाया हमने
छोड़ रिवायत ग़ज़ल में एक नया ही रंग जमाया हमने
सुख़नवरी के हुनर को नई बुलंदी पर पहुँचाया हमने
ऐसे ऐसे शेर कि मीरो-ग़ालिब भी फीके पड़ते थे
लोग दीवाने थे अपने और सब शायर हमसे जलते थे
अपनी शायरी पर लानत जो कभी किसी का शेर चुराया
नई रदीफ़ ज़मीनें दे इस फ़न को और अज़ीम बनाया
किसकी नज़र लगी है शायरी क्यों हमसे है आँख चुराती
कब से परेशाँ सोच रहे हैं ताज़ा ग़ज़ल अब क्यूँ नहीं आती
बीवी के जो पास मैं बैठा उसने मुझको ये समझाया
मेरी तबीयत ठीक नहीं है मुझपे है कोई भूत का साया
कई दिनों से सोया नहीं हूँ ढंग से खाना भी नहीं खाया
शायर सब अहमक़ होते हैं वक़्त अपना करते हैं ज़ाया
कौन उसे अब ये समझाए कितना ज़रूरी काम है मेरा
इल्म-ओ-अदब के गलियारों में कितना रौशन नाम है मेरा
कितना हिस्सा डाल रहा हूँ नई नस्ल की तरबीअत में
सर्फ़ किया है जीवन सारा मैंने उर्दू की ख़िदमत में
मुल्क-ओ-क़ौम के नाम मुहब्बत और अम्न पैग़ाम है मेरा
दुनिया को इतना कुछ देकर क्यूँ फिर ख़ाली जाम है मेरा
कोरे पन्नों का कोरापन कोई तरकीब नहीं भर पाती
इतने बड़े शायर को आख़िर ताज़ा ग़ज़ल अब क्यों नहीं आती
दिल को करके सख़्त किया तय आख़िर कुछ तो हल करते हैं
सोचा कोई ग़ज़ल लेकर उसमें कुछ रद्दो-बदल करते हैं
अपनी अलमारी को फरोला बाहर निकालीं डायरियां सारी
वालिद की इक डायरी में मिल गई हमें कुछ उनकी शायरी
पन्ने उलट पलट कर हमने ग़ज़ल चुनी उसमें से अधूरी
उसकी रदीफ़ ज़रा बदली और जुटे उसे करने में पूरी
क़ाफ़िया लिया सुहूलत वाला बहर ना लम्बी और ना छोटी
इक इक शेर पे मेहनत करके उनको हमने बनाया मोती
कुछ असरात फ़िराक़ के फिर कुछ ज़ौक़ और मोमिन के झलकाये
और करिश्मे अपने तख़य्युल और तग़ज़्ज़ुल के भी दिखाए
मात खा गए मक़्ते में जब कहीं तख़ल्लुस घुस नहीं पाया
शुक्र किया हुई ग़ज़ल मुक़म्मल हमने ना उस पे ज़ोर लगाया
शायरी से ‘शाहिद’ की तौबा ऐसी बला से हम बाज़ आये
लौट आये घर को बुद्धू और जान बची सो लाखों पाए
(मौलिक व अप्रकाशित)