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बुढ़ापा ....

तन पर दस्तक दे रही, जरा काल की शाम ।
काया को भाने लगा, अच्छा  अब  आराम ।1।

बीते कल की आज हम, कहलाते हैं शान ।
शान बुढ़ापे की हुई, अपनों से अंजान ।2।

झुर्री-झुर्री पर लिखा, जीवन का संघर्ष ।
जरा अवस्था देखती ,मुड़ कर बीते वर्ष ।3।

देख बुढ़ापा हो गया, चिन्तित क्यों इंसान ।
शायद उसको हो गया, अन्तिम पल का भान ।4।

काया में कम्पन बढी , दृष्टि हुई मजबूर ।
अपनों से अपने हुए, जरा काल में दूर ।5।

लघु शंका बस में नहीं, मुँह से गिरती लार ।
जरा अवस्था को मिला, तानों से शृंगार ।6।

बूढ़ी काया के सभी, टूट गए अरमान ।
जर्जर काया की बनी, लाठी अब सन्तान ।7।

जीवन हारा जीत से,  आई अन्तिम शाम ।
अंग- अंग देने लगा, चलने का पैगाम ।8।

सुशील सरना / 6-7-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 127

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Comment by Sushil Sarna on July 9, 2022 at 11:41am
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 8, 2022 at 1:02pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on July 8, 2022 at 10:27am
आदरणीय दयाराम जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार
Comment by Dayaram Methani on July 6, 2022 at 10:57pm

आदरणीय सुशील सरना जी, बुढ़ापे पर अति सुंदर सृजन के लिए बधाई।

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