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कम है-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२

गीत में सद् भावना का ज्वार कम है
सर्वहित की कामना का ज्वार कम है।१।
**
दे रहे  सब  सान्त्वना  पर  जानता हूँ
शुद्ध मन की प्रार्थना का ज्वार कम है।२।
**
सिद्ध कैसे  झट  से  होगी  योग  माया
आज साधक साधना का ज्वार कम है।३।
**
सत्य मर्यादा टिकेगी किस तरह अब
हर किसी में वर्जना का ज्वार कम है।४।
**
हर नगर श्मसान जैसा आज दिखता
किस नयन में वेदना का ज्वार कम है।५।
**
क्यों 'मुसाफिर' है भुलावे में बहुत तू
कौन से तन वासना का ज्वार कम है।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by Ravi Shukla on June 5, 2021 at 9:21pm

आदरणीय लक्षमण जी हिन्दी भाषा के शब्दों से सजी इस सुंदर गजल के लिये हार्दिक बधाई प्रस्तुत है 

कृपया ध्यान दे...

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