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मेरे किरदार पर धब्बा नही था

ग़ज़ल : 1222,1222,122

मेरे किरदार पर धब्बा नहीं था
तुम्हीं ने ग़ौर से देखा नही था

मेरे ग़म को समझता कोई कैसे
कोई मेरी तरह तनहा नहीं  था

मैं इक ठहरा हुआ तालाब था बस
वो दरिया था कभी ठहरा नहीं  था

तेरी हर बात सच्ची थी हमेशा 
फ़क़त लहजा ही बस अच्छा नहीं था

न आया जो नदी के पास यारो
वो प्यासा था मगर इतना नहीं था

नज़र मेरी थी मंज़िल पर हमेशा
थकन का पाओं से रिश्ता नहीं  था

तुम इसको जीत समझो "जोहना" पर 
हक़ीक़त ये है वो हारा नहीं था

साध्वी ‘जोहना’

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 12, 2020 at 3:00pm

आदरणीया साध्वी सैनी 'जोहना' जी आदाब, ओ बी ओ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। ओ बी ओ पर आपकी पहली प्रदर्शित ग़ज़ल शानदार हुई है, सभी शे'र इन्सानी जज़्बात से लबरेज़ और रवानी में हैं आपको भरपूर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ और पहली ही ग़ज़ल के फ़ीचर ब्लॉग्स में शामिल होने पर ख़ास मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए।

चन्द टंकण त्रुटियों की ओर आपका ध्यानाकर्षण चाहूँगा कुछ जगह "नहीं" में अं की बिन्दी लगना रह गई है इसके इलावा

//फकत लहज़ा ही बस अच्छा नहीं था//   इस मिसरे में फ़क़त में नुक़ते लगा लें और लहजा से नुक़्ता हटा दें।

//थकन का पाओं से रिश्ता नही था//        इस मिसरे में पाओं के बजाय जिस्म लफ़्ज़ ज़ियाद: बहतर होगा।  सादर। 

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