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क्षणिकाएं (२०२१ -१ )- डॉo विजय शंकर

जो समझते हैं
वे जमे पड़े हैं ,
ये ख्याल है उनका ,
सच में तो वे
केवल पड़े हैं। .........1 .

छत पड़ी भी नहीं
और बुनियाद खिसक रही है ,
वो महल बनाने चले थे
कितनों की झोपड़ी भी उजड़ गई ,
लोग फिसल रहे हैं या उनके
पैरों के नीचे जमीन खिसक रही है। ......... 2 .

यूँ ही सफर में ही गुजर जाए , जिंदगी
अच्छा है ,
जिनकी तलाश हो
वो मंजिलों पे मिला नहीं करते ll ......... 3 .

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on September 29, 2021 at 5:04pm

आदरणीय अमन सिन्हा जी , आपकी उपस्थिति एवं रचना को स्वीकृति प्रदान करने के लिए आभार एवं धन्यवाद ! सादर।

Comment by dandpani nahak on September 29, 2021 at 2:38pm
आदरणीय डॉ विजय शंकर जी प्रणाम! उम्द: क्षणिकाएँ हुईं हैं! हार्दिक बधाई स्वीकार करें
Comment by Samar kabeer on September 28, 2021 at 7:37pm

जनाब डॉ० विजय शंकर जी आदाब , बहुत उम्द; क्षणिकाएँ हुई हैं , इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I 

आजकल आप कहाँ हैं ?

Comment by AMAN SINHA on September 28, 2021 at 9:56am

बहुत खूब 

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