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ग़ज़ल : कामकाजी बेटियों का खिलखिलाना भा गया // -- सौरभ

2122 2122 2122 212

 

ये हुनर है, या लियाकत, दर्द पीना आ गया 
कामकाजी बेटियों का खिलखिलाना भा गया 
 
हम उन्हें क्या कुछ समझते थे बता पाये नहीं
पर उन्हें क्या-क्या बताते, खैर जो बीता, गया 
 
हम न थे काबिल कभी, हमने कभी कोशिश न की 
आपको पर क्या हुआ.. जो आपका दावा गया ?             [संशोधित, सौजन्य आ० समर साहब]
  
मैं निवेदन क्या करूँ संवेदना के मौन से
प्रेम के संधान में जो कुछ गया मेरा गया।
 
जब उनींदी आँखों में बीनाइयाँ घुलने लगीं 
पश्चिमी आकाश में सूरज इशारे पा गया 
 
पुस्तकों के शब्द के विन्यास औ' व्यवहार से 
वस्तुत: वे छल रहे थे, जानना दहला गया ।
  
रात्रि है, बारिश गहन, तिस पर अँधेरे की धमक
सूर्य के आह्वान पर मौसम भला क्या आ गया ? 
 
जो दमकते, कौंधते थे आज सब निस्तेज हैं
एक 'सौरभ' देखिए कुछ इस तरीके छा गया
***
सौरभ 
 
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 25, 2021 at 8:34pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत ही उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 25, 2021 at 6:58pm

जनाब अमीरुद्दीन ’अमीर’ साहब, प्रस्तुति पर आपकी आमद का स्वागत है.

निवेदन है, आप सरसरी निगाहों से नहीं, तनिक रुक कर, इत्मिनान और लिहाज़ से इस ग़ज़ल पर एक दफ़े फिर से ग़ौर फ़रमाएँ. वर्ना रचनात्मकता से बहुत बडा अन्याय कर बैठेंगे. यह किसी तौर पर उचित न होगा. 

बहरहाल, आप पाठक हैं, आपकी समझ का धन्यवाद. 

पुनः आपके आने का शुक्रिया. 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 25, 2021 at 5:42pm

जनाब सौरभ पाण्डेय जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ, मतले के दोनों मिसरे उम्दा हैं मगर आपस में रब्त नहीं है। 

'पुस्तकों के शब्द के विन्यास औ' व्यवहार से'   इस मिसरे के शब्द विन्यास पर नज़र्-ए-सानी फ़रमाएं। सादर।

  

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