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2122, 1122, 1122, 22

है दुआ तुझसे यूँ चमका दे मुक़द्दर मौला
कर दे ईमाँ से मेरे दिल को मुनव्वर मौला

अबरहा चल पड़ा है आज सितम ढाने को
भेज दे फिर से अबाबीलों का लश्कर मौला

मोड़ कर पैरों को सीने से लगा रक्खा है
फिर भी छोटी ही पड़े मेरी ये चादर मौला

होंगी कितनी हसीं जन्नत की वो हूरें आख़िर
सोचता रहता हूँ ये बात मैं अक्सर मौला

ज़िन्दगी कट तो गयी पर मैं जिसे अपना कहूँ
ऐसा इक पल न हुआ मुझ को मयस्सर मौला

इतनी दुश्वारियाँ आती हैं मेरी राहों में
लगने लगता है मुझे दरिया समंदर मौला

मेरे अशआर हुकूमत करें सब के दिल पर
तू बना दे मुझे इक ऐसा सुख़नवर मौला

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Md. Anis arman on July 13, 2021 at 1:24pm

जनाब लक्ष्मण धामी साहब ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 13, 2021 at 9:24am

आ. भाई अनीस जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Md. Anis arman on July 10, 2021 at 3:10pm

जनाब उस्ताद समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, आपकी इनायत है आपकी मुहब्बत हमेशा मुझे भिगोती रहे (aamin)

Comment by Md. Anis arman on July 10, 2021 at 3:07pm

जनाब अमीरुद्दीन अमीर साहब ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on July 10, 2021 at 2:56pm

जनाब अनीस अरमान जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 9, 2021 at 10:41pm

जनाब अनीस अरमान साहिब आदाब, रूहानी जज़्बात की अक्कासी करती ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

तीसरे शे'र में 'चादर' को चद्दर करना बहतर होगा। सादर। 

 

 

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