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जो नहीं है यार तू पास में तो न रंग-ए-फ़स्ल-ए-बहार हैं (135 )

ग़ज़ल( 11212 11212 11212 11212 )
जो नहीं है यार तू पास में तो न रंग-ए-फ़स्ल-ए-बहार हैं
न है बर्ग-ए-गुल न शमीम-ए-गुल मेरी ज़ीस्त में बचे ख़ार हैं
**
तेरे हिज्र से जो मिले हैं ग़म वही दौलतें हैं मेरी सनम
मेरी फ़िक्र का है सबब तो बस ये बढे हुए ग़म-ए-यार हैं
**
मेरे वास्ते है तू नाज़नीं बड़ी दिलनशीं लगे महज़बीं
अरे क्या हुआ जो ज़बीन पर पड़े चंद नक़्श-ओ-निगार हैं
**
गो है बह्र-ए-इश्क़ ये पुरख़तर प रुका नहीं है कभी सफ़र
भले चंद कस्तियाँ बह्र में हुईं मुश्किलों से ही पार हैं
**
तेरे दम से ही मेरे गीत हैं भले दूर आज तू मीत है
तेरी धुन पे ही तो थिरक रहे मेरे साज़-ए-दिल के ये तार हैं
**
हैं अदू जहाँ में सुकूँ के बस अना फ़िक्र और हसद-ओ-हवस
करे ग़ौर ठीक से गर बशर यही चार हैं यही चार हैं
**
न मिलेगी हूर न ही परी न जहान की कभी सरवरी
दे उन्हें ज़रा सी तो अक़्ल रब जो कि इक भरम के शिकार हैं
**
है मुसीबतों का जो वक़्त अब रखो थाम दामन-ए-सब्र सब
हमें डसने को यहाँ जा ब जा खड़े क़िस्म क़िस्म के मार हैं
**
की अता वबा ने जो बेबसी तो ग़रीब क्या करे ख़ुदक़ुशी
जब अमीर कितने ही बन रहे वबा का 'तुरंत 'शिकार हैं
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी
"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2021 at 11:39am

एक और बेहद खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय...

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 23, 2021 at 10:26pm

 भाई   लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी आपकी हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2021 at 9:30pm

आ. भाई गिरधारी सिह जी, खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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