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ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22

अगर कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना
मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे
जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी
कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको दुलार आये
वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन
मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़ देना

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 16, 2021 at 9:09am

ग़ज़ल पे आपकी शिरक़त के लिए बहुत बहुत शुक्रिया भी तमाम जी...

Comment by Aazi Tamaam on April 13, 2021 at 8:41am

बेहद खोइबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय बृज जी

सादर प्रणाम

आदरणीय अमीर सर ने जो 'भी' वाले शैर में सुझाया उसकी लय बेहद निखर के आ रही है

कभी हमारे ग़मों पे जो तुझ को प्यार आये

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना......... बेहतरीन शैर है

सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 13, 2021 at 6:36am

ये आपकी इस्लाह और आपस मे हुई चर्चा का नतीजा है आदरणीय अमीरुद्दीन जी...सादर आभार

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 13, 2021 at 12:51am

बृजेश जी, अब दोनों शे'र दुरुस्त हो गये हैं। बधाई हो। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2021 at 11:39pm

इसके अलावा चौथे शे'र में "भी प्यार" की जगह नया शब्द "दुलार" रखता हूँ जिसका अर्थ प्यार स्नेह ही होता है।इससे मात्रा पतन की जरूरत भी नही पड़ेगी।सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2021 at 11:35pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी विस्तार से बताने के लिए आपका अत्यंत आभारी हूँ।उला को 

अगर कभी जो करार आये झिंझोड़ देना...करता हूँ।क्योंकि सानी में मेरी और मुझे रखना ज्यादा जम रहा।

देखिये "अगर कभी जो करार आये झिंझोड़ देना

            मेरी उदासी मुझे अकेला न छोड़ देना.....बताइयेगा सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 12, 2021 at 7:40pm

//लेकिन जो मतला अभी है उसमें कोई कमी है??दरअसल मौजूदा स्थिति में मुझे रवानगी ज्यादा समझ मे आ रही।//

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी, हर शे'र में शाइर का अपना नज़रिया होता है, मतले के ऊला मिसरे में अगर आप का नज़रिया ये है कि मुझे बेक़रारी में रह रह कर बार बार क़रार आ सकता है तो आपका "कभी-कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना" कहना सही है। लेकिन अगर नज़रिया ये है कि ग़म और बेक़रारी की शिद्दत इतनी है कि शायद ही कुछ पलों के लिए क़रार आ सकता है तो "मुझे कभी जो क़रार आये झिंझोड़ देना" कहना सही होगा। सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2021 at 6:30pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित एवं इस्लाह के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया...आपका दोनों सुझाव बेहद खूबसूरत हैं।लेकिन जो मतला अभी है उसमें कोई कमी है??दरअसल मौजूदा स्थिति में मुझे रवानगी ज्यादा समझ मे आ रही।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 11, 2021 at 1:10pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें।

'कभी-कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

 मेरी उदासी मुझे अकेला न छोड़ देना'      इस शे'र को यूँ कहें -

'मुझे कभी जो क़रार आये झिंझोड़ देना

मेरी उदासी युँ ही अकेला न छोड़ देना'   

'कभी हमारे ग़मों पे तुझको भी प्यार आये'   इस मिसरे मेंं 'भी' की जगह जो करने से रब्त आयेगा।    सादर। 

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना'

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2021 at 9:51pm

सादर आभार आदरणीय धामी जी...

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