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विश्वास
और समर्पण
बस इतनी सी व्याख्या में
सिमटी है नारी
इसी विश्वास में
उसे मिले हैं धोखे
इसी समर्पण में वह
बनी है कुंवारी माँ
कोठे में बैठी है कभी
जान भी दी है, कई बार
फिर भी नहीं छोड़ा उसने
विश्वास करना
समर्पित होना
क्योंकि यह है नारी की प्रकृति
उसकी नैसर्गिकता
घात
तो तब होता है
जब नहीं कर पाती वह चुनाव
सही साथी का, सच्चे चरित्र का
मानवता की छवि का
और ऐसा होता है
अक्सर तब
जब आत्ममेधा से करती है वह
अपने भाग्य का निर्णय
और छली जाती है
समाज के श्वान और
दुर्दांत भेड़ियों से
हालाँकि कदापि वर्जनीय नहीं है
आत्म-मेधा का अधिकार
पर जब वह हो विश्वास से नियंत्रित
और विश्वास्
भी तब फलता है। समर्पण भी तब खिलता है
जब आपस में हो
प्रेम
और प्रेम की प्रतिदान भावना
जरूरी है जिसके लिए
एक दूजे का अटूट बंधन
जिसके बाद
नारी बनती है नदी
और मिलती है किसी सागर से
जहाँ दोनों ही होते है
पानी सिर्फ पानी
नदी तब
अपना अस्तित्व सौंपकर
स्वयं भी बन जाती है सागर
और तब बीतता है जीवन
कभी ज्वार सा कभी भाटे सा
अंतहीन, समर्पित
विश्वास से भरा
जहाँ तृप्ति पाती है नारी की प्रकृति
(मौलिक/ अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 9, 2021 at 12:34pm

आ. समर कबीर साहिब आपका शुक्रिया 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 9, 2021 at 12:33pm

आ. धामी जीआभार 

Comment by Samar kabeer on January 8, 2021 at 8:42pm

जनाब गोपाल नारायण जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2021 at 1:45pm

आ. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

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