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2212 1212 2212 1212

यूँ तो ये माहेरीन हैं मशहूर हैं ज़हीन हैं
फिर रगड़ें क्यों ज़मीन में कुर्सी को ये जबीन हैं


संसार है विचित्र यह नाकाम कामयाब सब
जो माहिर और ज़हीन हैं वह आज दीनहीन हैं


हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल
अक्सर ज़हीन लोग ही नाक़ाबिल-ए-यक़ीन हैं


बंदिश हज़ार थोप दीं तुम ये करो न वो करो
क्यों लड़कियां समाज में समझी गयीं रहीन हैं


जम्हूरियत तो नाम है चलता है हुक्म शाहों का
सब ऊंचे ऊंचे ओहदों पे इनके लवाहिक़ीन हैं


सब हुक्मरां हैं जेब में ज़ालिम खुले में घूमते
जो ज़ुल्म हों रिआया पे राजा तमाशबीन हैं


सर पर न सायबाने हैं खानाबदोश ज़िंदगी
अपने वतन में रह के भी हम क्यों मुहाजिरीन हैं


होती सियासत आजकल 'नोटों' के रंग रूप पर
नीले मिले यसार हैं पीले मिले यमीन हैं


ताउम्र दिल दिया नहीं वापस वो आज माँगते
आए जनाज़े में मेरे कितने मुनाफ़िक़ीन हैं


आए थे ख़्वाब में अभी बोसा लिया ओ चल दिये
अब तक हैं शीरीं लब मेरे लब उनके अंगबीन हैं


तुझसे मिले ख़ुशी हुई पर थी उदासी भी 'क़दम'
तू सुबोह सुबोह जाएगा तेरे बयां मुबीन हैं


माहेरीन...माहिर का बहुवचन
रहीन...गिरवी
लवाहिक़ीन... सगे संबंधी, निजी
मुहाजिरीन ..शरणार्थी
यसार..बाएं
यमीन..दाहिने
मुनाफ़िक़ीन..पाखंडी, ढौंगी
मुबीन..स्पष्ट

क़दम जयपुरी
जयपुर
मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Views: 160

Comment

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Comment by Om Prakash Agrawal on May 20, 2020 at 7:34pm
आदरणीय
जी सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद आदरणीय
Comment by नाथ सोनांचली on May 20, 2020 at 4:00pm

आद0 ओम प्रकाश अग्रवाल जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। उर्दू शब्दों से लबरेज। बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Om Prakash Agrawal on May 18, 2020 at 12:27pm
आदरणीय
प्रशंसा हेतु साभार धन्यवाद ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2020 at 12:19pm

आ. भाई ओमप्रकास जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Om Prakash Agrawal on May 16, 2020 at 4:53am
आदरणीय कबीर साहब
सराहना और बहुमूल्य सुझावों के लिये सहृदय आपार। आपके सुझावानुसार सुधार कर लेंगे।
पुनश्च आभार
Comment by Samar kabeer on May 15, 2020 at 8:19pm

जनाब क़दम जयपुरी जी आदाब,मुश्किल क़वाफ़ी में ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।


'हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल'

इस मिसरे में '
हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल

इस मिसरे में 'नुक़्ताचीं' में 'क' 

के नीचे नुक़्ता नहीं लगेगा ।

'सब ऊंचे ऊंचे ओहदों पे इनके लवाहिक़ीन हैं'

इस मिसरे में 'ओहदों' को "उहदों" कर लें ।


'सर पर न सायबाने हैं खानाबदोश ज़िंदगी'

इस मिसरे में 'सायबाने' को 'साइबान'' कर लें ।


'तू सुबोह सुबोह जाएगा तेरे बयां मुबीन हैैं'

इस मिसरे में 'सुबोह सुबोह' को "सुब्ह सुब्ह" कर लें ।

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