For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (334)

मोह माया मत समझ संसार को - ग़ज़ल

2122    2122   212

*********************

तन  से  जादा  मन  जरूरी  प्यार को

मन  बिना  आये हो क्या व्यापार को

***

मुक्ति  का  पहला  कदम  है  यार ये

मोह  माया  मत  समझ  संसार को

***

इसमें   शामिल  और  जिम्मेदारियाँ

मत समझ मनमर्जियाँ अधिकार को

***

डूब कर  तम में  गहनतम भोर तक

तेज   करता   रौशनी  की   धार  को

***

तब कहीं  जाकर  उजाला  साँझ तक

बाँटता   है   सूर्य   इस   संसार …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 12, 2014 at 9:42am — 21 Comments

गिड़गिड़ाने से बची कब लाज तेरी द्रोपदी-ग़ज़ल

2122    2122    2122    212

***

शब्द   अबला  तीर  में  अब  नार  ढलना  चाहिए

हर दुशासन का कफन  खुद तू ने  सिलना चाहिए

***

लूटता  हो  जब  तुम्हारी  लाज  कोई  उस समय

अश्क  आँखों   से  नहीं  शोला  निकलना  चाहिए

***

गिड़गिड़ाने   से   बची   कब   लाज  तेरी  द्रोपदी

वक्त पर उसको सबक कुछ ठोस मिलना चाहिए

**

हर समय तो आ नहीं सकता कन्हैया तुझ तलक

काली बन खुद  रक्त  बीजों  को  कुचलना चाहिए

**

फूल बनकर  दे महक  उपवन को  यूँ तो  रोज तू…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2014 at 12:47pm — 31 Comments

बेमजा यार सफर रोज नई राहों का

2122     112 2     1122    22

**

खार  हूँ  एक  ये  सोचा   है  सभी  ने मुझको

फूल के साथ  जो  देखा  है  सभी  ने  मुझको

**

बंद सदियों  से  पड़ा  था  मैं  किसी  कोने में

खत तेरा जान के  खोला  है सभी ने मुझको

**

भोर सा रास  तुझे  आज   मगर  आया क्यूँ

तम भरी  रात जो बोला  है  सभी ने मुझको

**

दाद  वैसे  तो   मिली  बात  बुरी भी  कह दी

बस तेरी  बात  पे  कोसा  है सभी ने मुझको

**

रूह  की  बात  किसे   यार  लगी  सौदों …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2014 at 10:30am — 25 Comments

सूरतों के साथ सीरत भी बदलनी चाहिए - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

बाद  इसके  भी  बहस  कुछ  और  चलनी चाहिए

सूरतों   के  साथ  सीरत  भी   बदलनी    चाहिए

**

चल  पड़े  माना  सफर  में  बात  इससे कब बनी

लौटने  को   घर   हमेशा   साँझ   ढलनी  चाहिए

**

आ  ही  जायेगा  भगीरथ  फिर  यहाँ  बदलाव को

आस की  गंगा  तुम्हीं  से फिर निकलनी चाहिए

**

है   जरूरी   देश   को   विश्वास   की   संजीवनी

मन हिमालय  में सभी के वो भी फलनी चाहिए

**

ब्याह की बातें  कहो या  फिर कहो तुम देश की

हाथ से  जादा …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 22, 2014 at 10:30am — 19 Comments

दर्द भूख का यारो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

मौत   बेटियों   को  बस,  दाइयाँ  समझती  हैं

पीर  के  सबब  को  सब  माइयाँ  समझती  हैं

**

सोच  आज  तक  भी जब,  है  गुलाम जैसी ही

मुल्क  की  अजादी  क्या, बेडि़याँ  समझती हैं

**

दो  बयाँ  भले  ही  तुम  देश  की  तरक्की के

हर खबर है सच कितनी सुर्खियाँ समझती हैं

**

आप   के  बयानों  में    खूब   है  सफाई  पर

बेवफा  कहाँ  तक  हो,   पत्नियाँ  समझती हैं

**

दोष  तुम  निगाहों   को  बेरूखी  की  देते  हो

कान …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 16, 2014 at 12:30pm — 11 Comments

माँ के सिवा - ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

** मेरे लिए आज मातृ दिवस और माँ की पुण्य तिथि का अद्भुत संयोग है l यह रचना माँ को समर्पित है l

जिंदगीभर  कौन देता  है खुशी माँ के सिवा

ले अॅधेरा  कौन  देता  रौशनी  माँ के सिवा

**

वह लहू  को कर  सुधा हमको हमेशा पोषती

कौन खुद को यूँ गला दे जिंदगी माँ के सिवा

**

बस रहे खुशहाल जग ये सोचकर भगवान भी

क्या बनाता और अच्छा इक नबी माँ के सिवा

**

दे के रिमझिम जिंदगी भर वो तपन हरती रहे

कौन अपनाता बता दे  तिश्नगी  माँ के…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 11, 2014 at 10:00am — 16 Comments

बात करते गाँव की - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

रोज    की   है   बादलों   से   छेड़खानी   आपने

और  गढ़  ली  प्यास  की  कोई  कहानी  आपने

***

चाह  रखते  हो  भगीरथ  सब  कहें  इतिहास में

पर न  खुद से  एक  दरिया  भी  बहानी  आपने

***

बात  करते  गाँव  की  पर कब  उसे  तरजीह दी

गाँव  को  तम  दे   सजाई   राजधानी    आपने

***

आपको दरिया मिली हर प्यास को सच है मगर

खोद  कूआँ  कब   निकाला  यार  पानी  आपने

***

लाख  दुख  मैं  मानता  हूँ  आपने  झेले  मगर

झोपड़ी  का  दुख  न   झेला  …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2014 at 12:00pm — 14 Comments

आचरण सबको यहाँ अब है नकाबों की तरह - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    212

***

हर खुशी  हमको  हुई  है अब सवालों  की तरह

और दुख आकर मिले हैं नित जवाबों की तरह

***

चाँद  निकला  तो  नदी में  देख छाया  खुश रहे

रोटियाँ  अब हम गरीबों को  खुआबों  की तरह

***

यूं कभी  जिसमें कहाये  यार हम  महताब थे

उस गली में आज क्यों खाना खराबों की तरह

***

एक भी आदत नहीं ऐसी कि तुझको  गुल कहूँ

पास काँटें क्यों रखो फिर तुम गुलाबों की तरह

***

है हमें तो जिन्दगी में साँस-धड़कन यार ज्यों

आप…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2014 at 9:30am — 13 Comments

मत कहो तुम है खिलाफत - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    2122

**



दर्द  दिल  का  जो  बढ़ा  दे, बोलिए  मरहम  कहाँ है

रौशनी  के दौर में  अब तम  के  जैसा  तम  कहाँ है

**

कर  रहे  तुम  रोज  दावे   चीज  अद्भुत   है  बनाई

नफरतें  पर  जो  मिटा दे  लैब में  वो  बम  कहाँ है

**

जै जवानों, जै किसानों,  की सदा  में थी कशिश जो

अब  सियासत  की  कहन  में यार वैसा दम कहाँ है

**

मत कहो तुम है खिलाफत धार के विपरीत चलना

चाहते  बस  जानना  हम  धार  का  उद्गम कहाँ…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 24, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

अगर हो जिंदगी देनी - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222

**  **

हॅसी  में  राज पाया  है, कि कैसे  उन  को मुस्काना

उदासी  से  तेरी   सीखे, कसम  से  फूल  मुरझाना

**

भले ही  खूब  महफिल  में, हया का  रंग  दिखला तू

गुजारिश तुझ से पर दिल की, अकेले में न शरमाना

**

करो नफरत से  नफरत तुम, इसी से  दूरियाँ बढ़ती

मुहब्बत  पास  लाती है, भला  क्या  इससे घबराना

**

हमें   है   बंदिशों   जैसे,  कसम  से  रतजगे  उसके

इसी से हो  गया मुश्किल, सपन में  यार अब…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 22, 2014 at 10:30am — 8 Comments

माँ के हाथों सूखी रोटी का मजा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122         212

आँसुओं को यूँ  मिलाकर  नीर में

ज्यों  दवा  हो  पी  रहा हूँ  पीर में

**

हाथ की रेखा  मिटाकर चल दिया

क्या लिखा है क्या कहूँ तकदीर में

**

कौन  डरता   जाँ  गवाने  के  लिए

रख जहर जितना हो रखना तीर में

**

हर तरफ उसके  दुशासन डर गया

मैं न था कान्हा  जो बधता चीर में

**

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में

**

शायरी  कहता  रहा…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 17, 2014 at 10:30am — 15 Comments

राजरानी के नवासे आप हैं - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122     2122      212



जानता  हूँ  देह   के  बेलौस  प्यासे  आप  हैं

किन्तु जनता की नजर में संत खासे आप हैं

*

खुशमिजाजी आप की सन्देश देती और कुछ

लोग कहते  यूँ बहुत पीडि़त  जरा से  आप है

*…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 11:00am — 14 Comments

बस्ती में कोई बच्चा नहीं देखा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222 1222 1222 1222

***

सियासत पूछ मत तुझमें पतन क्या-क्या नहीं देखा

बहुत  खुदगर्ज  देखे  हैं  मगर  तुझ  सा  नहीं  देखा

**

महज  कुर्सी को  दुश्मन से  करे तू लाख  समझौते

चरित तुझ सा  किसी का भी  यहाँ गिरता नहीं देखा

**

सपन में भी दिखा करती मुझे तो बस सियासत ही

सियासत से  मगर कच्चा  कोई  रिश्ता  नहीं  देखा

**

बराबर  बाटते   देखी   मुहब्बत  भी   समानों  सी

बड़ा-छोटा  करे  माँ  प्यार  का  हिस्सा  नहीं …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2014 at 12:30pm — 23 Comments

बहाकर अश्क भी यारो - ग़ज़ल

1222    1222     1222     1222

****

सिखाते  क्यों  हमें  हो  तुम वही इतिहास की बातें

दिलों में  घोलकर  नफरत  नये  विश्वास  की बातें

*

बताओ  घर   बनेगा  क्या  हमारा   आसमानों  में

जमीनें  छीन   के   करते  सदा  आवास  की  बातें

*

कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा

बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें

*

बहाकर  अश्क  भी  यारो  कहाँ  दुख  दूर  होते हैं

गमों  से  पार  पाने  को  करो   परिहास  की…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 29, 2014 at 7:30am — 29 Comments

चादरें छोटी मिली हैं किश्मतों की-ग़ज़ल

2122    2122    2122  

***

आदमी  को  आदमी  से  बैर  इतना

भर रहा अब खुद में ही वो मैर इतना

*

दुश्मनो  की  बात  करनी व्यर्थ है यूँ

अब  सहोदर  ही  लगे  है गैर इतना

*

चादरें  छोटी  मिली हैं  किश्मतों की

इसलिए भी मत  पसारो  पैर इतना

*

दे रहे  आवाज  हम  हैं  बेखबर  तुम

कर  रहे  हो किस  जहाँ  में सैर  इतना

*

किस तरह आऊं बता तुझ तक अभी मैं

गाव! उलझन  दे  गया  है  नैर  इतना

*

झूठ  होते  हैं  सियासत  के …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2014 at 8:30am — 20 Comments

सिखाता रावणों के गुर - ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222



किया माथे तिलक झट से कहा नाकाम भी मुझको

बहुत  ठोका  लुहारों  सा  दिया आराम  भी मुझको

*

गिरा तो भी  समझ मेरी  न आयी  शातिरी उसकी

बिठाया  पास  भी अपने किया बदनाम भी मुझको

*

पता  है  साथ  उसके तो  न आया  था कभी  सूरज

जलाता क्यो न जाने फिर शरद का घाम भी मुझको

*

हसाता  चोट  देकर  भी  बड़ा  जालिम  खुदा  पाया

रूला  देता  न मरने  का सुना  पैगाम  भी  मुझको

*

अजब सी रहमतें  उसकी  अजब ही  सब…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2014 at 6:30am — 14 Comments

गरल रख पास शिव जैसा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222



हमारे   दुख  दिखाई  कब  दिए  हैं  देवताओं को

हमेशा  आँकते वो   कम  हमारी  आपदाओं  को

*

मरें  या  जी रहे  हों हम  उन्हें  पूजा  करें  हरदम

न जब भी पूज पाए हम निकल आए सजाओं को

*

नहीं फिर भी हुए खुश वो भले ही सब किया अर्पण

गरल रख पास शिव जैसा सदा सौपा सुधाओं को

*

पुकारा  जब  गया  उनको  दुखों से  हो  परेशा ढब

किया है  अनसुना बरबस  हमारी सब सदाओं को

*

लगा करता जरूरी नित न जाने क्यों उन्हे…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2014 at 11:30am — 17 Comments

मगर अहसास पैदा हो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222



समझ   लूँ  मैं गुनाहों को भला अतवार1 से कैसे

मगर पूछूँ  तरीका  भी   किसी  अबरार2 से कैसे

**

सभी की थी दुआएं तो जला जब भी यहाँ  दीपक

मिटाया पर गया ना तब  बता अनवार3 से कैसे

**

हमेशा  बोलता  था  तू  नहीं  रिश्ता  रहा   कोई

गले लगती बता कमसिन किसी अगियार4 से कैसे

**

जुटा पाया न मैं साहस अना5 की बात कहने को

उलझ वो  भी  गई  पूछे किसी अफगार6 से कैसे

**

सदा लेते जनम वो तो गलत को ठीक करने…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2014 at 7:00am — 7 Comments

भूल थी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212

**

बचपने  में  चाँद  को  रोटी  समझना  भूल थी

कमसिनी में एक कमसिन से लिपटना भूल थी

**

तात  ने डाटा  किताबें  पढ़, मुहब्बत  में न पड़

तात से  इस बात  पर मेरा  झगड़ना  भूल  थी

**

कोख में जब मात ने  पाला न माना कुछ उसे

इक कली  के द्वार पर  माथा रगड़ना भूल थी

**

मिट गया वो, पात ने कर ली हवा से प्रीत जब

बेखुदी  में  डाल से  उसका  बिछड़ना  भूल थी

**

लूटता इज्जत भ्रमर नित दोष उसको  कौन…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2014 at 7:30am — 11 Comments

है मुहब्बत चीज ऐसी (ग़ज़ल ) -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    2122



राह  में  अवरोध  जितने, ओ!  जमाने  तूँ  लगा  ले

है  मुहब्बत  चीज  ऐसी, रास्ता  फिर  भी  बना  ले



हर जुनूँ  कमतर  है इसको, आग इसकी  कौन रोके

आशिकी  पीछे  हटी  कब, इम्तहाँ  गर  जो खुदा ले 



कैश  की  हर  पीर  लैला,  खीच  लेती  ओर  अपनी

है मुहब्बत को बहुत कम, जुल्म जग जितने बढ़ा ले

इस मुहब्बत की बदौलत, शिव फिरे ले शव सती का

अंध   देखे  रंग  दुनिया, नेह  में  जब  मन  रमा  ले

खत्म …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 14, 2014 at 7:00am — 13 Comments

Monthly Archives

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब आदाब ग़ज़ल पर आपकी शिर्क़त और सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ. आपकी…"
32 minutes ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post मुझे ना मार पाएगी (अतुकान्त)
"आ0 समर कबीर साहेब, रचना सुन्दर लगी , जानकर प्रसन्न हूँ। बहुत आभार आपका"
11 hours ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post मुझे ना मार पाएगी (अतुकान्त)
"आ0 लक्ष्मण धामी  'मुसाफिर ' जी । आपको रचना सुन्दर लगी , जानकर खुशी…"
11 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ओजोन दिवस के दोहे
"आ. भाई सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार।"
12 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post तुम्हारे इन्तज़ार में ........
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post बेबसी.........
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post समयानुकूल
"जनाब सुरेश कुमार कल्याण जी आदाब, दोहों का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें । 'सुखदुख…"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post मुझे ना मार पाएगी (अतुकान्त)
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'हालत जो तेरी देखी है…"
14 hours ago
Samar kabeer commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ओजोन दिवस के दोहे
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, अच्छे दोहे रचे आपने, बधाई स्वीकार करें ।"
18 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post उम्मीद .......
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
18 hours ago
Samar kabeer commented on AMAN SINHA's blog post झूठी सख्शियत
"जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें । रचना का शीर्षक  'झूठी…"
18 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service