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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – October 2015 Archive (24)

"पैंतीस का उत्सव" - (लघुकथा) 23 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अंकल जी, बर्थडे का सामान दे दो , ये छोटा वाला केक कितने में मिलेगा ?" - सोनू ने बेकरी वाले से पूछा।

"डेढ़ सौ रुपये का"

जवाब सुनकर सोनू आँखें फाड़े साथियों की तरफ देखने लगा । सभी ने अपनी जेबों से पैसे निकाले। कुछ सिक्के, कुछ पुराने फटे से नोट, कुल जमा पैंतीस रुपये थे। छोटे भाई का बर्थडे तो मनाना ही है।



"लो अंकल जी, पैंतीस रुपये में छोटा सा कोई केक और बाक़ी सामान पैक कर दो !" - सोनू ने निराश हो कर कहा। बेकरी वाले को हँसी आ गई । फटे पुराने से कपड़े पहने हुए बच्चों को देखकर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:00pm — 9 Comments

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा) 22 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा)



"आदरणीय, आज तुम मुझे बार-बार यूँ घूर-घूर कर क्यों देख रहे हो, अपनी इन उँगलियों से मुझे बार-बार यूँ क्यों छू रहे हो ?' - उसने कुछ इतराते हुए पूछा।



"प्रिये, आज तुम पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो, तुम्हारा प्रत्येक अंग, हर एक हिस्सा मुझे सुंदर और मुस्कराता सा लग रहा है !"



"और तुम, तुम भी तो बहुत दिनों बाद बहुत ख़ुश नज़र आ रहे हो, तभी तो तुम मेरे लिए नई श्रंगार सामग्री लाये हो, वरना कब जाते हो तुम बाज़ार। तुम्हें तुम्हारे तरीक़े से जश्न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:31am — 7 Comments

"दो लावणी छंद व दो मुक्तक " - [काव्य रचना] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दो छंद व दो मुक्तक --



दो लावणी छंद--



[30 मात्रा/ 16 व 14 पर यति/ अंत में 21वर्जित

/ मापनी मुक्त]





कराये जब स्तनपान शिशु को,

माँ ममता ही बरसाये,

आधुनिका तो बस तरसाती,

ख़ुद ममता को झुठलाये।

इतरा रही हैं नव- वधुयें,

आधुनिक सोच अपनाकर,

पश्चिमी फैशन की नकल पर,

शरीर अपना ढलवाकर।

[1]



यकीन नहीं तो यकीन करो,

रिश्ते बनते जाएंगे,

यकीन के दम पर सब जीते,

सभी प्रेम बरसायेंगे।

आस्था छोड़ी जिसने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 28, 2015 at 9:47am — 3 Comments

"ममता, दोस्ती और मुहब्बत" - गीतिका -[ 3] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

[आधार छंद : 'विधाता']

1222 1222 1222 1222





कभी अपने मुसीबत में, ज़रा भी काम आये हैं,

जिन्हें समझा नहीं था दोस्त वे नज़दीक लाये हैं।



जिसे माना, जिसे पूजा, उसे घर से भगा कर के,

बुढ़ापे में, जताकर स्वार्थ, ममता को भुलाये हैं।

तुम्हारे पास दिल रख तो दिया गिरवी भरोसे पर,

पता मुझको चला तुमने, हज़ारों दिल दुखाये हैं।



कभी वे फोन पर बातें करेंगी, स्वर बदलकर के,

कभी वे नेट पर चेटिंग, झिलाकर के बुलाये हैं।



न जाने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 26, 2015 at 8:30am — 10 Comments

"औरत सी ज़मीन और जमीर" - [लघु कथा] 21 / _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जिठानी तो बस फसल कटने पे अपना हिस्सा माँगने लगती हैं, खुद शहर की हो गई, हमें बाप-दादाओं की खेती के काम तो चलाना ही है!"- खेत पर हल जोतते हुए माथे का पसीना पोंछ कर सावित्री ने देवरानी मंगला से कहा।



"मर्दों में वो कुव्वत रही नहीं, तो बेटों का मन कैसे लगे ऐसी खेती में !"- मंगला ने एक हाथ से पल्लू ठीक करते हुए अपने घर के मर्दों और ज़मीन के हालात पर कटाक्ष किया।



"लेकिन एक बात तो मानना पड़ेगी, गाँव छोड़के शहर में भले वो अभी झुग्गी झोपड़ी में रह रही है, लेकिन वो अपने बेटों की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 24, 2015 at 9:00am — 6 Comments

मेरी कुछ हाइकू रचनाएँ [हाइकू] (2)/ _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

(1)
छंद रच ले
छंद का समारोह
काव्य आरोह।

(2)
मन पसंद
लिख ले कुछ छंद
बिना पैबंद।

(3)

छंद में बंद
भावनायें पसंद
विधान द्वंद।

(4)
छन-छन के
निकलते ये छंद
उत्कृष्ट चंद।

(5)
छंद सुनाओ
सत्य हमें बताओ
चेतना लाओ।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2015 at 10:30am — 4 Comments

"गुम्मन चाय वाला" - (लघु कथा) (20)

"चच्चा, लो पियो जे कड़क चाय, लेकिन मेरी कविता ज़रूर पढ़कर जाना" - गुम्मन ने बड़े उत्साह से कहा।

थोड़ी देर बाद वहीद चच्चा बोले- "ओय गुम्मन, तू तो बड़ी अच्छी कविता लिख लेता है, आज पता चली तेरी काबीलियत और तेरा 'असली' नाम।"

"हाँ चच्चा, छुटपन में एक बार ठण्ड के साथ तेज़ बुख़ार होने पे बिना किसी को बताये टेबल पे रखी रजाई की तह में छिपकर सो गया था। घरवाले घण्टों ढूंढते रहे। जब मिला तो "गुम" कहके चिढ़ाने, बुलाने लगे। इस चाय की दुकान पे सब "गुम्मन" कहने लगे। स्कूल छूटा तो असली नाम भी गुम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2015 at 8:30pm — 7 Comments

"एक और वार" - [लघु-कथा] (19)

हल्की 'टप्प' की आवाज़ के साथ स्मार्ट फोन की स्क्रीन पर दो बूँदें गिरीं । एक लम्बी साँस लेकर पश्चाताप और आक्रोश की ज्वाला फिर भड़क उठी। यह वही तस्वीर है न, जो शालिनी के बेहद क़रीबी 'दोस्त' ने ली थी, उस दिन मोबाइल पर।फोटो लेते समय ही उसकी आँखें फटी की फटी सी रह गयीं थीं। उस छिछोरे के हाव-भाव ही संदेहास्पद थे। शालिनी ने तो उसे जीन्स या शोर्ट्स पहनकर चलने को कहा था , लेकिन वह सलवार सूट पहन कर ही उस 'आत्म-रक्षा प्रशिक्षण कैम्प' में गई थी। शालिनी का कुशल व्यवहार उसे पसंद था, लेकिन वह समझ न सकी कि…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 17, 2015 at 11:34am — 3 Comments

"प्यारी दुश्मन" -[लघु कथा] (18)

"प्यारी दुश्मन"- (लघु-कथा)



"तुम्हें जब अपने पास नहीं आने देती तो तुम अपनी समधन को क्यों नहीं बुला लेतीं ?"- पड़ोसन ने पार्वती से कहा।



"वो भी करके देख लिया, कह रही थी कि जब

तक दामाद जी खुद फोन करके नहीं बुलायेंगे, नहीं आऊंगी।" पार्वती ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा- "और बेटा कहता है कि मम्मी तुम्हारे होते हुए सासू माँ को बुलाने की क्या ज़रूरत है।"



पड़ोसन ने समझाते हुए कहा-" न तो तुम्हारी बहू पूरी दवायें ले रही है, न परहेज़ ढंग से कर रही है और न ही तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — No Comments

"प्यारी दुश्मन" -[लघु कथा] (18)

"प्यारी दुश्मन"- (लघु-कथा)



"तुम्हें जब अपने पास नहीं आने देती तो तुम अपनी समधन को क्यों नहीं बुला लेतीं ?"- पड़ोसन ने पार्वती से कहा।



"वो भी करके देख लिया, कह रही थी कि जब

तक दामाद जी खुद फोन करके नहीं बुलायेंगे, नहीं आऊंगी।" पार्वती ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा- "और बेटा कहता है कि मम्मी तुम्हारे होते हुए सासू माँ को बुलाने की क्या ज़रूरत है।"



पड़ोसन ने समझाते हुए कहा-" न तो तुम्हारी बहू पूरी दवायें ले रही है, न परहेज़ ढंग से कर रही है और न ही तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — 1 Comment

"प्यार-संस्कार" - (गीतिका) [2]

2122 2122 2122 21

आधार छंद- रूपमाला (मापनी-मुक्त)



चार दिन की चाँदनी है, चार दिन का प्यार,

प्यार का बीमार कहता, भावना व्यापार।

[1]



आज हम त्योहार पर ही, बांटते हैं प्यार,

काश हम हर 'वार' को ही, बांटते हर बार।

[2]



काश उन्हें पूछते हम, बेचते जो प्यार,

झेलते तन बेचकर ही, रोज़ अत्याचार।

[3]



भागते फिरते जुटाने, रोज़ धन को लोग,

तब तरसते खूब रहते, छोड़ कर सब प्यार।

[4]



जाग कर के रात को हो, मौन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 10:15pm — 5 Comments

"सखेद" - [छंद- चौपईया/जयकरी पर आधारित]

[छंद- चौपईया/जयकरी पर आधारित मापनी मुक्त रचना]



रहो सोचते तुम मत आज,

कर लो जो करना है काज।

भले दूसरों की मत मान,

मन की अपने तुम लो जान । /1/



नुक्ता-चीनी करते टोक,

नेक काम पर थोपें रोक।

यही इस ज़माने का राज़,

कर्मयोगी समझ लो आज। /2/



होता शिक्षा का व्यापार,

रहे निर्धन वर्ग लाचार।

है योजनाओं का प्रचार,

फिर भी होते अत्याचार। /3/



टी.वी., फ़िल्मों को तू देख,

भूल गीता-क़ुरआन-लेख,

पाठ सिखाते सारे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 2:00pm — 9 Comments

"थोपी क्षमा" - [लघु कथा - 17]

"थोपी क्षमा" - (लघु कथा)



कक्षा में पीछे बैठे हुए मित्र को मोबाइल पर चित्र दिखा रहे छात्र को शिक्षक ने रंगे हाथों पकड़ लिया। छात्र ने फुर्ती से मोबाइल दूसरे मित्र तक पहुँचा दिया और पूरी कक्षा के सामने शिक्षक को झूठा-शक्की करार दे दिया। दो थप्पड़ मार कर शिक्षक ने उससे सच बोलने को और 'क्षमा' माँगने को कहा, किन्तु छात्र ने शिक्षक का हाथ सख्ती से पकड़ लिया। शिक्षक उसे खींचता हुआ कक्षा से बाहर 'प्राचार्य-कक्ष' की ओर ले जाने लगा।



"तुम क्या ले जाओगे मुझे, मैं लिये चलता हूँ तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 9:30pm — 5 Comments

"नाम के मुसलमान" - [लघु कथा- 16]

"फोन करने और 'ईद मुबारक़' कहने की क्या ज़रूरत थी ?" शबाना ने एतराज़ जताते हुए कहा।

" तो तुमने इतने सालों बाद भी मेरी आवाज़ पहचान ली थी ! फिर तुमने अपने शौहर को क्यों दे दिया फोन ?" कुछ नाराज़गी के लहज़े में आफताब ने पूछा।

"ग़ैर मर्दों से यूँ फोन पर बातें करना हमारे यहाँ मना है। आवाज़ क्या, तुम्हारी तो रग-रग से वाकिफ हूँ मैं तो !" लम्बी साँस लेते हुए शबाना ने उसे समझाया- " देखो, गढ़े मुर्दे उखाड़ कर ज़ख़म कुरेदने से कोई फायदा नहीं ! तुम्हारे वालिद साहब ही घर आये थे और उन्होंने बहुत…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 8:00am — 3 Comments

ऐसा हो नव-जीवन -[ काव्य-रचना]

आत्म-मंथन से,
चिंतन-मनन से,
कुछ सुधरे,
अपना जीवन,
स्वार्थों से,
लोभ से,
अंधविश्वास,
अंधानुकरण से,
मुक्त रहे जो,
ऐसा हो नव-जीवन।
प्रकृति से,
संस्कृति से,
नीति-रीति से,
सहज अनुकूलन।
आचरण से,
सदानुकरण से,
पर्यावरण से,
श्रेष्ठ संतुलन,
ऐसा हो नव जीवन।

(मौलिक व अप्रकाशित)
_शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी म.प्र.

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 12, 2015 at 8:48am — 7 Comments

"नज़रिया" - [लघु कथा - 16]

"नज़रिया" - (लघु कथा)



एक दिन बेडरूम में काली चीटियों के झुंड को देखकर शीनू ने अपने पिता जी से कहा-" पापा, दीवार पर ये इतनी सारी चीटियां लाइन बनाकर कहां जा रही हैं, उनके तो मुँह में भी कुछ है !"



"बेटा, वे अपने भोजन का इन्तज़ाम कर रही हैं, लगता है कुछ 'जुगाड़' हो गया है।"



"जुगाड़ ! जुगाड़ में इतनी सारी चीटियां इकट्ठा ! जैसे कि कोई 'दावत' या 'भोज' हो रहा हो !"



"हाँ बेटा, ये चीटियां मिल जुलकर अनुशासन में खाना शेयर करती हैं। देखो, पूरा परिवार ही नहीं, पूरा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2015 at 10:39pm — 4 Comments

"महकती रोती दुनिया" - [लघु कथा - 15]

"महकती रोती दुनिया" - [लघु कथा]



"बड़े ग़ज़ब की बात थी कि कष्ट उठाते हुए भी उनके चेहरों पर मुस्कान बरकरार थी, भीड़-भाड़ में भी उनके चेहरे खिल रहे थे। एक ने दूसरे से सटकर पूछा- "क्यों तुम्हारा क्या कसूर था? "



"वही, जो तुम्हारा था"- उत्तर देकर दूसरे ने कहा- " सुनो, ज़रा ये तो बताओ, तुम कौन से ख़ानदान से हो ?"



"अबे, ये क्यों पूछ रहा है? जो लिखा है सो होके रहेगा। कोई कहीं भी ले जाये, होना सबका वही है, जो होता आया है।"



"तुम्हारे कहनेे का मतलब क्या है, समझा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2015 at 3:29pm — 5 Comments

"अनपढ़-गंवार" - [लघु कथा -14]

अपनी सास और जेठ-जिठानी से पिंड छुड़ाने के बाद, खुद को नये ज़माने की कहने वाली मात्र बारहवीं पास छोटी बहू काजल अब काफी संतुष्ट थी। बेटे को दूध पिलाने के लिए पति को राजी कर एक बकरी भी अब उसने पाल ली थी। गांव की एक लड़की से हर रोज़ की तरह घर की साफ-सफाई और लीपा-पोती करवाने के बाद आज काजल भोजन पकाने की तैयारी कर ही रही थी कि पति की ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। आज फिर पड़ोसी से झगड़ा हो गया था। बेटे को वहीं रसोई में छोड़ फुर्ती से वह बाहर की ओर भागी। जैसे-तैसे झगड़ा शांत कराकर जब वापस…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 9, 2015 at 9:00am — 6 Comments

गीतिका

गीतिका, आधार छंद- वाचिक महालक्ष्मी

(212 212 212)



शब्द अब गीत रचने लगे,

राज़ दिल के बिखरने लगे। /1/

दोस्त दुश्मन सभी दूर हैं

अब स्वयं को समझने लगे। /2/



नौकरी रिश्वतों से मिली,

आज अक्षम चमकने लगे। /3/



ठोकरें दीं सभी ने हमें,

पैर रखकर कुचलने लगे। /4/



प्रेम, दोस्ती रही आज तक,

शक हमें दूर रखने लगे। /5/



युग्म जुड़ कर करेंगे भला,

गीतिका-भाव भरने लगे। /6/



(मौलिक व अप्रकाशित)

_शेख़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:07am — 9 Comments

"प्रत्युत्तर पैरोडी पर" - [लघु कथा]

क्रिकेट मैच जीतने के बाद मोहल्ले के लड़के जश्न मनाते हुए एक टीले पर बैठे हुए थे। मोटू सोनू ने अपनी टाइट शर्ट के बटन सही करते हुए कहा- "अब मैं करता हूँ आमिर खान की नकल ! टी.वी. पे वो नया विज्ञापन देखा है न....

"हम अब भी वहीं के वहीं खड़े हैं, न हम बदले, न हम मोटे हो रहे हैं।

ये तो कमबख़्त कपड़ों की है शरारत, जो अपने आप छोटे हो रहे हैं! "

"वाह, क्या बात है, इसी पे पैरोडी हो जाये। बोल संजू अब तू बोल "- उनमें से एक ने कहा।

संजू शुरू हो गया- "हम अब भी वहीं खड़े हैं, न हम बदले,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 7, 2015 at 11:00am — 6 Comments

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