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देहात में, सिवान से (नवगीत) // --सौरभ

क्या हासिल हर किये-धरे का ?

गुमसी रातें

बोझिल भोर !

 

हर मुट्ठी जब कसी हुई है

कोई कितना करे प्रयास

आँसू चाहे उमड़-घुमड़ लें

मत छलकें पर

बनके आस

 …

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Added by Saurabh Pandey on December 30, 2015 at 2:32am — 6 Comments

एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

221 2122  221 2122

रौशन हो दिल हमारा, इक बार मुस्कुरा दो 

खिल जाय बेतहाशा, इक बार मुस्कुरा दो 

 

पलकों की कोर पर जो बादल बसे हुए हैं

घुल जाएँ फाहा-फाहा, इक बार मुस्कुरा दो

 

आपत्तियों के…

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Added by Saurabh Pandey on November 4, 2015 at 11:30pm — 24 Comments

ब्राह्मणवाद (अतुकान्त) // --सौरभ

अतिशय उत्साह

चाहे जिस तौर पर हो 

परपीड़क ही हुआ करता है 

आक्रामक भी. 

 

व्यावहारिक उच्छृंखलता वायव्य सिद्धांतों का प्रतिफल है 

यही उसकी उपलब्धि है 

जड़हीनों को…

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Added by Saurabh Pandey on September 6, 2015 at 7:30pm — 31 Comments

किन्तु इनका क्या करें ? (नवगीत) // -सौरभ

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..

पाँच-तारी चाशनी में पग रहे

सपने रवा !

किन्तु इनका क्या करें ?



क्या पता आये न बिजली

देखना माचिस कहाँ है

फैलता पानी सड़क…

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Added by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 2:00am — 38 Comments

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर विशेष // --सौरभ

योग वस्तुतः है क्या ?

===============

इस संदर्भ में आज मनोवैज्ञानिक, भौतिकवैज्ञानिक और विद्वान से लेकर सामान्य जन तक अपनी-अपनी समझ से बातें करते दिख जायेंगे. इस पर चर्चा के पूर्व यह समझना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति किसी विन्दु पर अपनी समझ बनाता कैसे है…

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Added by Saurabh Pandey on June 21, 2015 at 3:30am — 26 Comments

ग़ज़ल - गीत कविता ग़ज़ल रुबाई क्या ? // --सौरभ

२१२२ १२१२ २२

साफ़ कहने में है सफ़ाई क्या ?

कौन समझे पहाड़-राई क्या ?



चाँद-सूरज कभी हुए हमदम ?

ये तिज़ारत है, ’भाई-भाई’ क्या ?



सब यहाँ जी रहे हैं मतलब से

मैं…

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Added by Saurabh Pandey on May 25, 2015 at 11:00am — 52 Comments

एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये

कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये



खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  

फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये



ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’

उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी…

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Added by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 6:30pm — 40 Comments

एक तरही ग़ज़ल - होली है हुलासों की // --सौरभ

221 1222   221 1222

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !

कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !

 

संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..

फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो

 

ये होंठ बदन बाहें…

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Added by Saurabh Pandey on February 26, 2015 at 6:00pm — 16 Comments

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में (नवगीत) // --सौरभ

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में

कुम्हलाये-से दिन !



सूरज अनमन अगर पड़ा था..

जानो--

दिन कैसे तारी थे..

फिर से मौसम खुला-खुला है..

चलो, गये जो दिन भारी थे..



सजी…

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Added by Saurabh Pandey on January 8, 2015 at 2:14pm — 13 Comments

कविता मत लिखो (अतुकान्त) // --सौरभ

आप कविता लिखते हैं ? .. कौन बोला लिखने को..?

शब्द पीट-पीट के अलाय-बलाय करने को ?

मारे दिमाग़ खराब किये हैं ?

कुच्छ नहीं बदलता.. कुच्च्छ नहीं. ..

इतिहास पढ़े हैं ?

क्या बदला आजतक ? ...

खलसा कलेवर !…

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Added by Saurabh Pandey on January 8, 2015 at 12:00am — 16 Comments

ग़ज़ल - बोलिये किसको सुनायें.. // -- --सौरभ

2122 2122 2122 212

 

दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई  

गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई



बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक

काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई



चाँद अलसाया निहारे जा…

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Added by Saurabh Pandey on December 25, 2014 at 9:30pm — 35 Comments

नये साल का मौसम आया (नवगीत) // --सौरभ

नये साल के नये माह का

मौसम आया..

लेकिन सूरज भौंचक

कितना घबराया है !



चटख रंग की हवा चली है

चलन सीख कर..

खेल खेलती, बंदूकों के राग सुनाती

उनियाये कमरों में बच्चे रट्टा…

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Added by Saurabh Pandey on December 19, 2014 at 3:31am — 20 Comments

ग़ज़ल - इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ? // --सौरभ

२१२२  १२१२  २२



इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ?

पूछिये निर्झरों से - "अविरल क्या ?"



घुल रहा है वजूद तिल-तिल कर

हो रहा है हमें ये अव्वल क्या ?



गीत ग़ज़लें रुबाइयाँ.. मेरी ?

बस तुम्हें पढ़ रहा हूँ, कौशल क्या ?



अब उठो.. चढ़ गया है दिन कितना..

टाट लगने लगा है मखमल क्या !



मित्रता है अगर सरोवर से

छोड़िये सोचते हैं बादल क्या !



अब नये-से-नये ठिकाने हैं..

राजधानी चलें !.. ये चंबल क्या ?



चुप न…

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Added by Saurabh Pandey on October 25, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

सहज लगाव हृदय में हिलोड़ जाते हैं ।

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥



किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले

निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी

तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी…

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Added by Saurabh Pandey on October 21, 2014 at 5:30am — 20 Comments

दियालिया उजास दे (नवगीत) // --सौरभ

आँक दूँ ललाट पर

मैं चुम्बनों के दीप, आ..

रात भर विभोर तू

दियालिया उजास दे..



संयमी बना रहा

ये मौन भी विचित्र है

शब्द-शब्द पी

करे निनाद-ब्रह्म का वरण..…

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Added by Saurabh Pandey on October 5, 2014 at 11:30am — 30 Comments

नदी, जिसका पानी लाल है (कविता) // --सौरभ

संताप और क्षोभ

इनके मध्य नैराश्य की नदी बहती है, जिसका पानी लाल है.



जगत-व्यवहार उग आये द्वीपों-सा अपनी उपस्थिति जताते हैं

यही तो इस नदी की हताशा है

कि, वह बहुत गहरी नहीं बही अभी

या, नहीं हो पायी…

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Added by Saurabh Pandey on September 15, 2014 at 3:00am — 40 Comments

हिन्दी भाषा पखवारे पर (नवगीत) // --सौरभ

अस्मिता इस देश की हिन्दी हुई

किन्तु कैसे हो सकी

यह जान लो !!

कब कहाँ किसने कहा सम्मान में..

प्रेरणा लो,

उक्तियों की तान लो !



कंठ सक्षम था

सदा व्यवहार में…

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Added by Saurabh Pandey on September 1, 2014 at 5:30am — 39 Comments

जय-जय कन्हैया लाल की.. (नवगीत) //--सौरभ

लिख रही हैं यातनायें

अनुभवों से

लघुकथायें -

मौसम-घड़ी-दिक्काल की !

जय-जय कन्हैया लाल की !!



शासकों के चोंचले हैं   

लोग गोवर्द्धन उठायें

हम लुकाठी…

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Added by Saurabh Pandey on August 17, 2014 at 2:00am — 26 Comments

राष्ट्र-रूप (घनाक्षरी) // --सौरभ

देश  है नवीन  किन्तु, राष्ट्र है सनातनी ये,  मान्यता और संस्कार की  लिये निशानियाँ

था समस्त लोक-विश्व क्लिष्ट तम के पाश में, भारती सुना रही थी नीति की कहानियाँ

संतति  प्रबुद्ध मुग्ध  थी  सुविज्ञ  सौम्य उच्च, बाँचती थी धर्म-शास्त्र को सदा जुबानियाँ

स्वीकार्यता  चरित्र  में,   प्रभाव  में  उदारता,   शांत  मंद  गीत  में  सदैव थीं…

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Added by Saurabh Pandey on August 11, 2014 at 2:30am — 30 Comments

दादी, हामिद और ईद (लघुकथा) // --सौरभ

हामिद अब बड़ा हो गया है. अच्छा कमाता है. ग़ल्फ़ में है न आजकल !

इस बार की ईद में हामिद वहीं से ’फूड-प्रोसेसर’ ले आया है, कुछ और बुढिया गयी अपनी दादी अमीना के लिए !

 

ममता में अघायी पगली की दोनों आँखें रह-रह कर गंगा-जमुना हुई जा रही हैं. बार-बार आशीषों से नवाज़ रही है बुढिया. अमीना को आजभी वो ईद खूब याद है जब हामिद उसके लिए ईदग़ाह के मेले से चिमटा मोल ले आया था. हामिद का वो चिमटा आज भी उसकी ’जान’ है.

".. कितना खयाल रखता है हामिद ! .. अब उसे रसोई के ’बखत’ जियादा जूझना नहीं…

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Added by Saurabh Pandey on July 29, 2014 at 3:00pm — 61 Comments

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